Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 216

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ बु꣣न्दं꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢दे जा꣣तः꣡ पृ꣢च्छा꣣द्वि꣢ मा꣣त꣡र꣢म् । क꣢ उ꣣ग्राः꣡ के ह꣢꣯ शृण्विरे ॥२१६॥

आ꣢ । बु꣣न्द꣢म् । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । द꣣दे । जातः꣢ । पृ꣣च्छात् । वि꣢ । मा꣣त꣡र꣢म् । के । उ꣣ग्राः꣢ । के । ह꣣ । शृण्विरे ॥२१६॥

Mantra without Swara
आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम् । क उग्राः के ह शृण्विरे ॥

आ । बुन्दम् । वृत्रहा । वृत्र । हा । ददे । जातः । पृच्छात् । वि । मातरम् । के । उग्राः । के । ह । शृण्विरे ॥२१६॥

Samveda - Mantra Number : 216
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में ‘इषा’ शब्द ‘ज्ञान' का संकेत कर चुका है। 'शतवाजया' शब्द ‘शक्ति' का। इस मन्त्र में ‘वृत्रहा' शब्द ज्ञान को आवृत करनेवाले राग-द्वेषादि वृत्रों के विनाश की सूचना दे रहा है। इस प्रकार ज्ञान से मस्तिष्क को, नैर्मल्य से मन को तथा शक्ति से शरीर को चमकानेवाला यह ‘त्रिशोक' तीन दीप्तियोंवाला ‘काण्व' मेधावी पुरुष (जात:) = आचार्यकुल से दूसरा जन्म लेने पर [तं जातं द्रष्टुं अभि संयन्ति देवाः] अर्थात् आचार्य की भट्टी में परिपक्व होकर संसार में आने पर स्वयं (वृत्रहा) = सब वासनाओं का विनाश करनेवाला बनकर (बुन्दम्) = तीर को आददे=हाथ में ग्रहण करता है । यह (मातरम् विपृच्छात्) = माता के हिंसक को पूछता है। पता करता है कि कौन हिंसक है। (के उग्रा:) = कौन उग्र हैं- तेज स्वभाव के हैं (के ह आशृणिवरे)=कौन निश्चय से चारों ओर अपनी उग्रता के कारण ख्यात [notorious] हैं। उन्हें जानकर यह उन्हें समाप्त करने के प्रयत्न में लग जाता है।

मनुष्य का उद्देश्य मज़े से खाते-पीते जीवन बिताना नहीं है। उसे अन्याय के विरुद्ध संग्राम करते हुए अन्याय को दूर करने में ही जीवन यापन करना चाहिए। 
Essence
हमारा जीवन अन्याय के विरुद्ध एक 'दीर्घ संग्राम' हो ।
Subject
परदे को दूर करना [ घूँघट के पट खोल रे ]