Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 213

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
तु꣡भ्य꣢ꣳ सु꣣ता꣢सः꣣ सो꣡माः꣢ स्ती꣣र्णं꣢ ब꣣र्हि꣡र्वि꣢भावसो । स्तो꣣तृ꣡भ्य꣢ इन्द्र मृडय ॥२१३॥

तु꣡भ्य꣢꣯म् । सु꣣ता꣡सः꣢ । सो꣡माः꣢꣯ । स्ती꣣र्ण꣢म् । ब꣣र्हिः꣢ । वि꣣भावसो । विभा । वसो । स्तो꣡तृभ्यः꣢ । इ꣣न्द्र । मृडय ॥२१३॥

Mantra without Swara
तुभ्यꣳ सुतासः सोमाः स्तीर्णं बर्हिर्विभावसो । स्तोतृभ्य इन्द्र मृडय ॥

तुभ्यम् । सुतासः । सोमाः । स्तीर्णम् । बर्हिः । विभावसो । विभा । वसो । स्तोतृभ्यः । इन्द्र । मृडय ॥२१३॥

Samveda - Mantra Number : 213
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में प्रभु ने जीव से कहा था कि ये सोमकण मैंने तेरे लिए उत्पन्न किये हैं, तूने इनका ठीक उपयोग करके 'वामदेव गोतम' बनना है । सुन्दर दिव्यगुणों को उत्पन्न करने में और इन्द्रियों को प्रशस्त बनाने में इनका उपयोग करना है। जीव कितने उत्तम शब्दों में इसका उत्तर देता है कि ये (सुतासः सोमा:) = उत्पन्न सोमकण (तुभ्यम्) = तेरे लिए विनियुक्त किये गये हैं, अर्थात् इनका अपव्यय करना तो दूर रहा, तेरी प्राप्ति के लिए इनका प्रयोग किया है। इससे बढ़कर उत्तम इनका विनियोग हो ही क्या सकता है? जड़ जगत् की यह सर्वोत्तम वस्तु है, इससे मैंने चेतन जगत् की सर्वोत्तम वस्तु आपको पाने का प्रयत्न किया है। हे विभावसो= ज्ञानधन प्रभो! आपके स्वागत के लिए ही मैंने (बर्हिः) = निर्मल हृदय को (स्तीर्णम्) = बिछाया है। ‘बर्हि' उस हृदयान्तरिक्ष का नाम है जिसमें से सब वासनारूप झाड़-झंखाड़ को उखाड़कर परे फेंक दिया गया है। वस्तुतः सोमकणों की रक्षा का यह भी परिणाम है कि हृदय वासनामुक्त हो जाता है। इस वीर्यरक्षा से हम उस ज्ञानधन प्रभु से ज्ञान को प्राप्त करनेवाले भी बनते हैं। एवं, वीर्यरक्षा के तीन लाभ होते हैं १. प्रभु की प्राप्ति २. हृदय की वासना शून्यता तथा ३. ज्ञान की प्राप्ति।

वीर्यरक्षा के द्वारा इन तीनों परिणामों को अपने जीवन में प्रकट करनेवाले व्यक्ति ही प्रभु के सच्चे स्तोता हैं। वे प्रार्थना करते हैं - हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली, अज्ञानान्धकार के नाशक प्रभो! हम (स्तोतृभ्यः)=स्तोताओं के लिए (मृडय) = सुख दीजिए।

ये स्तोता ज्ञान को अपनी शरण बनाने के कारण 'श्रुतकक्ष' हैं। ये प्रभु को 'विभावसु' के रूप में देखते हैं। सर्वोत्तम शरण ज्ञान ही है, अतः ये 'सुकक्ष' हैं, भोगमार्ग की ओर न जाने से ये शक्ति-सम्पन्न अङ्गोंवाले 'आङ्गिरस' हैं।
Essence
हम वीर्यरक्षा के द्वारा ज्ञान व नैर्मल्य को प्राप्त करके प्रभु को पानेवाले बनें।
Subject
जीव प्रभु के प्रति