Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 212

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मे꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣡माः꣢ सु꣣ता꣢सो꣣ ये꣢ च꣣ सो꣡त्वाः꣢ । ते꣡षां꣢ मत्स्व प्रभूवसो ॥२१२

इ꣣मे꣢ । ते꣣ । इन्द्र । सो꣡माः꣢꣯ । सु꣣ता꣡सः꣢ । ये । च꣣ । सो꣡त्वाः꣢꣯ । ते꣡षा꣢꣯म् । म꣣त्स्व । प्रभूवसो । प्रभु । वसो ॥२१२॥

Mantra without Swara
इमे त इन्द्र सोमाः सुतासो ये च सोत्वाः । तेषां मत्स्व प्रभूवसो ॥२१२

इमे । ते । इन्द्र । सोमाः । सुतासः । ये । च । सोत्वाः । तेषाम् । मत्स्व । प्रभूवसो । प्रभु । वसो ॥२१२॥

Samveda - Mantra Number : 212
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि 'वामदेव गोतम' है- सुन्दर दिव्य गुणोंवाला तथा प्रशस्तेन्द्रिय | इसे प्रभु कहते हैं कि (इन्द्र) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! (इमे) = ये (सोमाः)=शक्ति के कण (ये)=जो (सुतास:) = पैदा किये गये हैं (च)= और जो (सोत्वा) = आगे उत्पन्न किये जाएँगे ये सब (ते)= तेरे लिए हैं। वीर्यशक्ति अत्यन्त मूल्यवान् वस्तु है, उसे प्रभु जीव के लिए उत्पन्न करने की व्यवस्था करते हैं। यदि जीव उसका अपव्यय कर देता है तो वह प्रभु का प्यारा कैसे हो सकता है?

प्रभु कहते हैं कि (प्रभूवसो)= [प्रभुश्च वसुश्च] इन्द्रियों पर प्रभुत्व पानेवाले और निवास को उत्तम बनानेवाले जीव! (तेषां मत्स्व) = उन वीर्य-कणों की रक्षा के द्वारा तू आनन्द प्राप्त कर। संसार की छोटी-छोटी घटनाओं से मानव जीवन विकल हो उठता है, परन्तु संयमी के जीवन में सांसारिक कष्टों में भी आनन्द की धारा विच्छिन्न नहीं होती। 
 
Essence
हम इस बात को सदा स्मरण रक्खें कि वीर्यशक्ति आध्यात्मिक विकास के लिए उत्पन्न की गई है। सन्तान- निर्माण इसका गौण उद्देश्य है।
Subject
प्रभु जीव के प्रति