Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 209

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡रं꣢ त इन्द्र꣣ श्र꣡व꣢से ग꣣मे꣡म꣢ शूर꣣ त्वा꣡व꣢तः । अ꣡र꣢ꣳ शक्र꣣ प꣡रे꣢मणि ॥२०९

अ꣡र꣢꣯म् । ते꣣ । इन्द्र । श्र꣡व꣢꣯से । ग꣣मे꣡म꣢ । शू꣣र । त्वा꣡व꣢꣯तः । अ꣡र꣢꣯म् । श꣣क्र । प꣡रे꣢꣯मणि ॥२०९॥

Mantra without Swara
अरं त इन्द्र श्रवसे गमेम शूर त्वावतः । अरꣳ शक्र परेमणि ॥२०९

अरम् । ते । इन्द्र । श्रवसे । गमेम । शूर । त्वावतः । अरम् । शक्र । परेमणि ॥२०९॥

Samveda - Mantra Number : 209
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि 'वामदेव गोतम' है- सुन्दर दिव्य गुणोंवाला, प्रशस्त इन्द्रियोंवाला अथवा उत्तम वेदवाणियोंवाला। यह प्रभु से प्रार्थना करता है कि (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (शूर) = [शृ हिंसायाम्] सब वासनाओं का हिंसन करनेवाले प्रभो! हम (ते)= आपके (श्रवसे) = ज्ञान के श्रवण के लिए (त्वावतः) = आप-जैसे ब्रह्मनिष्ठ पुरुष के समीप (अरं गमेम) = खूब प्राप्त हों और (शक्र) = हे सर्वशक्तिमन् प्रभो! (परेमणि) = उत्कृष्ट मार्ग पर [एमन्=course, way] (अरं गमेम) = खूब चलें।

उल्लिखित मन्त्रार्थ में सत्सङ्ग को कारण बताया गया है, सदाचरण को उसका कार्य । हमें सदा उन लोगों का सङ्ग करना जो (त्वावतः) = प्रभु - जैसे हों। ब्रह्मनिष्ठ व्यक्तियों के सङ्ग से हमारी बुद्धि सुन्दर बनती है और हम उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करनेवाले बनते हैं। वेद के शब्दों में हमारा सङ्ग ‘ज्ञानी ब्राह्मणों, रक्षा में तत्पर क्षत्रियों व दानी वैश्यों से हो । इस प्रकार उत्कृष्ट सङ्ग को पाकर हम अपने ज्ञान को तो बढ़ाएँ ही, साथ ही हम सदा उत्कृष्ट मार्ग पर चलनेवाले बनें। प्रभुकृपा से हम सत्सगङ्ग को प्राप्त कर सदाचारी हों । 
Essence
सत्सङ्ग हमारे जीवन के मार्ग को उत्कृष्ट बनाए।
Subject
सत्सङ्ग व सदाचरण