Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 204

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣣र꣡णिं꣢ वो꣣ ज꣡ना꣢नां त्र꣣दं꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः । स꣣मान꣢मु꣣ प्र꣡ श꣢ꣳ सिषम् ॥२०४॥

त꣣र꣡णि꣢म् । वः꣣ । ज꣡ना꣢꣯नाम् । त्र꣣द꣢म् । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । स꣣मा꣢नम् । स꣣म् । आन꣢म् । उ꣣ । प्र꣢ । शँ꣣सिषम् ॥२०४॥

Mantra without Swara
तरणिं वो जनानां त्रदं वाजस्य गोमतः । समानमु प्र शꣳ सिषम् ॥

तरणिम् । वः । जनानाम् । त्रदम् । वाजस्य । गोमतः । समानम् । सम् । आनम् । उ । प्र । शँसिषम् ॥२०४॥

Samveda - Mantra Number : 204
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ‘त्रिशोक काण्व' है - वह बुद्धिमान जिसने अपने शरीर, मन व मस्तिष्क तीनों को दीप्त किया है। यह ‘त्रिशोक' कहता है कि मैं (उ) = निश्चय से (प्रशंसिषम्) = उस प्रभु की कीर्ति का गायन करता हूँ जो (वः जनानाम्) = तुम सब मनुष्यों के (तरणिम्) = तैरानेवाले हैं, अर्थात् जो प्रभु हम सबको इस वासनामय संसार - समुद्र से पार करते हैं। प्रभु के नाम-स्मरण से ही मनुष्य संसार के प्रलोभनों को जीत पाता है। विषय-वासनाओं को जीतकर मनुष्य वाजी=शक्तिशाली बनता है और इस शक्तिरूप ईंधन से ज्ञानाग्नि के प्रज्वलित होने पर ज्ञानसम्पन्न बन पाता है। वे प्रभु इस (वाजस्य) = शक्ति के पुञ्ज (गोमतः) = प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियोंवाले अथवा वेदवाणियों का उत्तम मन्थन करनेवाले व्यक्ति को (त्र-दम्)=त्राण देनेवाले हैं।

प्रभु की रक्षा का पात्र वही व्यक्ति बनता है जो मन को निर्व्यसन बनाकर शरीर को शक्तिशाली बनाता है और इस प्रकार शक्ति के संयम द्वारा सबल शरीरवाला होकर मस्तिष्क को वेदज्ञान से परिपूर्ण करता है। यही 'त्रिशोक' है- इसके मन, मस्तिष्क व शरीर तीनों ही उज्ज्वल हैं।

वे प्रभु ‘समानम्’ हैं—सम्= सम्यक् उत्तम प्रकार से आन [आनयति, सोत्साहान् करोति] उत्साहित करनेवाले हैं। त्रिशोक कहता है कि मैं इस (समान)=सदा सम्यक् उत्साहित करनेवाले प्रभु का ही गुणस्तवन करता हूँ। जिससे मेरी लक्ष्य दृष्टि स्थिर रहे और जैसे वे प्रभु ('त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी') = तीन ज्योतियों से समवेत हैं-कभी उनसे पृथक् नहीं होते, उसी प्रकार मैं भी शरीर की नीरोगता व सबलता से, मन के नैर्मल्य से तथा बुद्धि की तीव्रता से तीन ज्योतियों का अपने में समावेश करनेवाला बनूँ। तभी तो मेरा त्रिशोक नाम 'सार्थक' होगा।
Essence
मैं त्रिशोक बनकर प्रभु के उत्साह का भाजन बनूँ।
Subject
प्रभु कब उत्साहित करते हैं?