Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 20

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢꣫दित्प्र꣣त्न꣢स्य꣣ रे꣡त꣢सो꣣ ज्यो꣡तिः꣢ पश्यन्ति वास꣣र꣢म् । प꣣रो꣢꣫ यदि꣣ध्य꣡ते꣢ दि꣣वि꣢ ॥२०॥

आ꣢त् । इत् । प्र꣣त्न꣡स्य꣢ । रे꣡त꣢꣯सः । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । प꣣श्यन्ति । वासर꣢म् । प꣣रः꣢ । यत् । इ꣣ध्य꣡ते꣢ । दि꣣वि꣢ ॥२०॥

Mantra without Swara
आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि ॥

आत् । इत् । प्रत्नस्य । रेतसः । ज्योतिः । पश्यन्ति । वासरम् । परः । यत् । इध्यते । दिवि ॥२०॥

Samveda - Mantra Number : 20
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत् दिवि) = जिस दिन (पर:)= क्लेश, कर्म, विपाकादि से परे होनेवाला वह प्रभु (इध्यते)= दीप्त किया जाता है (आत् इत्)= ठीक उसी समय प्(रत्नस्य रेतस:)= उस सनातन शक्ति की प्रभु की (वासरम्)=बसानेवाली (ज्योतिः)=ज्योति को (पश्यन्ति)= देखते हैं।

गत मन्त्र में ज्ञानपूर्वक कर्म करने का वर्णन था। 'मनुष्य उन कर्मों को अपनी शक्ति से होता हुआ न समझ ले, इसलिए इस मन्त्र में कहा गया है कि सनातन शक्ति तो वह प्रभु ही है। उसी से शक्ति प्राप्त कर जीव भी कर्म किया करता है। 'परन्तु बुरे कर्म भी उसी से हो रहे हैं, यह सोचकर जीव उनके फल से छूट नहीं सकता, क्योंकि वह प्रभु तो 'वासर-ज्योति' है। वह तो निवासक है, न कि ध्वंसक। उस प्रभु ने ‘निर्माणात्मक कार्यों' के करने के लिए ही शक्ति दी है–उजाड़ने के लिए नहीं। वह प्रभु निवासक ज्योति है। यह देखकर जीव भी शक्ति का प्रयोग बसाने में करे, नकि उजाड़ने में, तभी वह प्रभु का प्रिय बनेगा और इस मन्त्र का ऋषि 'वत्स' होगा
Essence
उस वासर ज्योति का दर्शन कर हम शक्ति का प्रयोग निर्माण के लिए नकि ध्वंस के लिए।
Subject
वासर ज्योति का दर्शन