Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 199

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢ इ꣣षे꣡ द꣢दातु न ऋभु꣣क्ष꣡ण꣢मृ꣣भु꣢ꣳ र꣣यि꣢म् । वा꣣जी꣡ द꣢दातु वा꣣जि꣡न꣢म् ॥१९९॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । इ꣣षे꣢ । द꣣दातु । नः । ऋभुक्ष꣡ण꣢म् । ऋ꣣भु । क्ष꣡ण꣢꣯म् । ऋ꣣भु꣢म् । ऋ꣣ । भु꣢म् । र꣣यि꣢म् । वा꣣जी꣢ । द꣣दातु । वाजि꣡न꣢म् ॥१९९॥

Mantra without Swara
इन्द्र इषे ददातु न ऋभुक्षणमृभुꣳ रयिम् । वाजी ददातु वाजिनम् ॥

इन्द्रः । इषे । ददातु । नः । ऋभुक्षणम् । ऋभु । क्षणम् । ऋभुम् । ऋ । भुम् । रयिम् । वाजी । ददातु । वाजिनम् ॥१९९॥

Samveda - Mantra Number : 199
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ‘'श्रुतकक्ष आङ्गिरस' है। ज्ञान को शरण बनानेवाला अर्थात् खूब ज्ञानी, तथा अङ्ग-अङ्ग में रसवाला शक्ति सम्पन्न । वस्तुतः ज्ञान और शक्ति का विकास करनेवाला व्यक्ति ही प्रभु को पाने का अधिकारी बनता है। यह प्रभु से प्रार्थना करता है कि (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (नः) = हमें (इषे) [इष् गतौ ] = प्रभु के ज्ञान व प्रभु की ओर जाने के लिए और अन्त में प्रभु को पाने के लिए (ऋभुक्षणम्)=महान् (ऋभुम्)=[ऋतेन भाति] सत्य से दीप्त रयिम्=ज्ञानरूप सम्पत्ति को ददातु - दे। वेदवाणी महान् है, वह सब सत्य ज्ञानों से दीप्त है। प्रभु मुझे उस वेदवाणी को प्राप्त कराएँ, जिससे मैं प्रभु को पा सकूँ।

ज्ञान के साथ शक्ति का भी उतना ही महत्त्व है। प्रभु ज्ञान के पुञ्ज हैं, 'विशुद्धाचित्त्' [Pure knowledge] हैं और साथ ही शक्ति के पुञ्ज हैं—('तेजोऽसि'), अतः यह ऋषि
प्रार्थना करता है कि (वाजी)=शक्ति का भण्डार प्रभु (वाजिनम्) = शक्ति-सम्पन्न (रयिम्) = धन (ददातु)=दे। 

(‘इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे श्रियमश्नुताम्') इस यजुर्वाक्य के अनुसार ‘श्रुतकक्षआङ्गिरस’ ज्ञान [ब्रह्म] व बल [क्षत्रम्] दोनों को शोभासम्पन्न बनाता है और चाहता है कि उसकी सम्पत्ति ज्ञान व बल के रूप में ही हो । यही सम्पत्ति उपादेय है। ज्ञान और शक्ति का सम्पादन करके ही हम प्रभु को प्राप्त करते हैं। अकेला ज्ञान व अकेली शक्ति लङ्गड़े व अन्धे की भाँति हैं। दोनों का मेल ही पूर्णता को पैदा करता है। पूर्णता होने पर हम पूर्ण प्रभु के सखा बनते हैं। सखित्व के लिए समानशीलता आवश्यक है। 
Essence
मैं ‘श्रुतकक्ष आङ्गिरस' [ज्ञानी व शक्तिसम्पन्न] बनूँ, जिससे प्रभु को पा सकूँ।
Subject
प्रभु को प्राप्त करने के लिए