Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 188

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣢ धि꣣या꣡ च꣢ गव्य꣣या꣡ पु꣢꣯रुणामन्पुरुष्टुत । य꣡त्सोमे꣢꣯सोम꣣ आ꣡भु꣢वः ॥१८८॥

अ꣣या꣢ । धि꣣या꣢ । च꣣ । गव्यया꣢ । पु꣡रु꣢꣯णामन् । पु꣡रु꣢꣯ । ना꣣मन् । पुरुष्टुत । पुरु । स्तुत । य꣢त् । सो꣡मे꣢꣯सोमे । सो꣡मे꣢꣯ । सो꣣मे । आ꣡भु꣢꣯वः । आ꣣ । अ꣡भु꣢꣯वः ॥१८८॥

Mantra without Swara
अया धिया च गव्यया पुरुणामन्पुरुष्टुत । यत्सोमेसोम आभुवः ॥

अया । धिया । च । गव्यया । पुरुणामन् । पुरु । नामन् । पुरुष्टुत । पुरु । स्तुत । यत् । सोमेसोमे । सोमे । सोमे । आभुवः । आ । अभुवः ॥१८८॥

Samveda - Mantra Number : 188
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
स्वाध्याय करनेवाला यह वत्स ज्ञान [श्रुत] को ही अपनी शरण [कक्ष] बनाता है, अतः श्रुतकक्ष' नामवाला हो जाता है। यह प्रभु से कहता है कि (अया) = [अनया] इस धिया-बुद्धि से (च) = और (अया गव्यया)= इस ज्ञानेन्द्रियों के समूह से हे (पुरुणामन्) = पुरुष्टुत प्रभो! यह तो निश्चित ही है (यत्) = कि (सोमेसोमे) = प्रत्येक विनीत बने पुरुष में (आभुवः) = आप प्रकट हुआ करते हैं ।

स्वाध्याय के दो लाभ गत मन्त्र में उल्लिखित हुए थे। स्वाध्याय का तीसरा लाभ यह है कि मनुष्य की बुद्धि व ज्ञानेन्द्रियों का सुन्दर विकास होता है। बुद्धि व ज्ञानेन्द्रियों का विकास होने पर यह संसार में एक महती शक्ति को कार्य करते हुए अनुभव करता है। यह उसी के नाम का खूब जप करता है और उसी का निरन्तर स्तवन करता है। उसका जप व स्तवन, पुरु है [पृ पालन- पूरणयो:] - इसका पालन व पूरण करनेवाला है, इसे अभिमान आदि दुर्भावनाओं का शिकार होने से बचाता है और इसकी न्यूनताओं को दूर करता है।

जितना-जितना इसका जीवन पूर्ण होता जाता है उतना उतना ही यह सोम बनता चलता है। एवं, स्वाध्याय का चौथा लाभ यह है कि मनुष्य में संसार की सञ्चालक रहस्यमयी शक्ति का चिन्तन होता है, वह उसका स्तवन व जप करता है। पाँचवाँ लाभ यह होता है कि यह उत्तरोत्तर विनीत बनता जाता है। इस सोमे-सोमे-विनीत और विनीत ही श्रुतकक्ष में आभुवः = प्रभु का प्रकाश होता है - यह श्रुतकक्ष प्रभु का साक्षात्कार कर पाता है। यह मानव-जीवन का चरम उत्थान है—इसी में इस जीवन की सार्थकता व सफलता है। यहाँ यह जीवन समाप्त होकर मानव को मुक्त कर देता है।
Essence
स्वाध्याय से हम बुद्धि व ज्ञानेन्द्रियों का विकास करें, संसार की सञ्चालक शक्ति के नामों का जप व स्तुति करनेवाले बनें, सोम बनकर प्रभु का दर्शन करें।
Subject
स्वाध्याय का लाभ