Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1871

1875 Mantra
Devata- संग्रामशिषः Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः पायुर्भारद्वाजो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣣न्धा꣡ अ꣢मित्रा भवताशीर्षा꣣णो꣡ऽह꣢य इव । ते꣡षां꣢ वो अ꣣ग्नि꣡नु꣢न्नाना꣣मि꣡न्द्रो꣢ हन्तु꣣ व꣡रं꣢वरम् ॥१८७१

अन्धाः꣢ । अ꣣मित्राः । अ । मित्राः । भवत । अशीर्षाणः꣢ । अ꣣ । शीर्षाणः꣢ । अ꣡ह꣢꣯यः । इ꣣व । ते꣡षा꣢꣯म् । वः꣣ । अग्नि꣡नु꣢न्नानाम् । अ꣣ग्नि꣢ । नु꣣न्नानाम् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ह꣣न्तु । व꣡रं꣢꣯वरम् । व꣡र꣢꣯म् । व꣣रम् ॥१८७१॥

Mantra without Swara
अन्धा अमित्रा भवताशीर्षाणोऽहय इव । तेषां वो अग्निनुन्नानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम् ॥१८७१

अन्धाः । अमित्राः । अ । मित्राः । भवत । अशीर्षाणः । अ । शीर्षाणः । अहयः । इव । तेषाम् । वः । अग्निनुन्नानाम् । अग्नि । नुन्नानाम् । इन्द्रः । हन्तु । वरंवरम् । वरम् । वरम् ॥१८७१॥

Samveda - Mantra Number : 1871
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
अमित्र वे हैं जिन्होंने [जिमिदा स्नेहने] स्नेह का पाठ नहीं पढ़ा । यदि ये कुछ भी सोचते तो इनका व्यवहार ऐसा स्नेहशून्य न होता । छोटों के साथ स्नेह से चलना ही चाहिए, क्योंकि वे न जाने कब तक हमारे साथ रहें । यदि वे छोटी अवस्था में चले गये तो हमें उनके प्रति बोले गये कटु शब्द काटते रहेंगे और उन्होंने सदा बच्चे भी तो नहीं बने रहना । ये कटु शब्द ही उनके हृदयों में हमारे लिए निरादर के भाव में परिणत हो जाएँगे।

अपने बराबरवालों के साथ तो कटु शब्द बोलने ही नहीं चाहिएँ, क्योंकि वे कटु शब्द द्विगुणित होकर हमारे प्रति ही लौटेंगे। इस प्रकार परस्पर वैर बढ़ता चलेगा । वृद्धों के साथ भी कटु शब्द नहीं बोलने, क्योंकि उनका जीवन अब थोड़ा ही तो बचा है, हम उन्हें अन्तिम समय अशान्त क्यों करें ? इस प्रकार स्पष्ट है कि अ-मित्र वे ही हैं जो द्वेष के कटु शब्दों के परिणामों को देखते नहीं । वेद कहता है कि (अमित्रा:) = कटुता से वर्तनेवालो ! (अन्धाः भवत) = क्या अन्धे हुए हो– कटुता का दुष्परिणाम तुम्हें दिखता नहीं ? (अ-शीर्षाण:) = तुम्हारा दिमाग़ है या नहीं; क्या विचारशक्ति में तुमने ताला ही लगा दिया है। तुम तो ('अहयः इव') = साँपों- जैसे हो गये हो । या तो औरों को डसते ही फिरना या फिर अपने विष से स्वयं अन्दर - ही - अन्दर जलना । तुम्हारे जीवन का लक्ष्य भी तो औरों से बदला लेते रहना या फिर अन्दर ही अन्दर द्वेषाग्नि से जलते रहना हो गया है। -

इस प्रकार के व्यक्तियों के लिए ऐसी व्यवस्था हो कि अग्नि के समान प्रकाश की दीप्तिवाले ब्राह्मण इन्हें द्वेष के मार्ग को छोड़कर प्रेम का मार्ग अपनाने का उपदेश दें, परन्तु यदि अचानक कुछ ऐसे हतवृत्त व्यक्ति हों जो किसी प्रकार के उपदेश से नहीं सुधर सकते हों तब राजा उन्हें दण्डित करे, जिससे प्रजा को उनके क्रोध का पात्र न होना पड़े । वेद कहता है कि (तेषां वः) = उन तुममें से (अग्नि-नुन्नानाम्) = जिनको अग्रणी ब्राह्मणों ने प्रेरणा प्राप्त कराई, परन्तु जिन्होंने उस प्रेरणा को नहीं सुना ऐसे दुष्टों में जो (वरंवरम्) = उत्तम हैं, अर्थात् firstclass rogues हैं, प्रथम श्रेणी के धूर्त हैं, उन्हें (इन्द्रः) = राजा (हन्तु) = दण्डित करे । दण्ड का नियम सदा यही है कि पहले ब्राह्मण समझाए और फिर विवशता में राजा दण्ड दे ।
Essence
हम सोचें, समझें और प्रेम का पाठ पढ़ें ।
Subject
प्रेम का पाठ पढ़ो [ Those who do not love ]