Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1867

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शासो भारद्वाजः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि꣢꣯ रक्षो꣣ वि꣡ मृधो꣢꣯ जहि꣣ वि꣢ वृ꣣त्र꣢स्य꣣ ह꣡नू꣢ रुज । वि꣣ म꣣न्यु꣡मि꣢न्द्र वृत्रहन्न꣣मि꣡त्र꣢स्याभि꣣दा꣡स꣢तः ॥१८६७॥

वि꣢ । र꣡क्षः꣢꣯ । वि । मृ꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि । वि꣢ । वृ꣣त्र꣡स्य꣢ । ह꣢꣯नूइ꣡ति꣢ । रु꣣ज । वि꣢ । म꣣न्यु꣢म् । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अमि꣡त्र꣢स्य । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯स्य । अ꣡भिदा꣡स꣢तः । अ꣣भि । दा꣡स꣢꣯तः ॥१८६७॥

Mantra without Swara
वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज । वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः ॥

वि । रक्षः । वि । मृधः । जहि । वि । वृत्रस्य । हनूइति । रुज । वि । मन्युम् । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अमित्रस्य । अ । मित्रस्य । अभिदासतः । अभि । दासतः ॥१८६७॥

Samveda - Mantra Number : 1867
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
संसार में ‘अप्रतिरथ’=अद्वितीय योद्धा [a matchless warrior] तो वही है जो बाह्य शत्रुओं को जीतने की भाँति आन्तर शत्रुओं को कुचलने का ध्यान करता है। कामादि वासनाओं का अनुशासन = नियन्त्रण करने के कारण यह 'शास' कहलाता है, इसी के परिणामरूप अपने जीवन में शक्ति भरनेवाला होने से यह ‘भारद्वाज' है । इसने प्रभु की इस प्रेरणा को सुना है व इस आदेश का पालन किया है |

१. (रक्षः) = अपने रमण के लिए [र] औरों के क्षय [क्ष] की वृत्ति को, (मृधः) = औरों की हत्या कर देने की भावना को तू (विजहि) = विशेषरूप से नष्ट कर डाल । मनुष्य जिस समय अपने आमोदप्रमोद [enjoyment] को प्रधानता दे देता है तब वह इसके प्रधान साधनभूत धन का दास बन जाता है और सभी टेढ़े-मेढ़े साधनों से धन कमाने लगता है— औरों की हत्या करनी पड़े तो उसमें भी हिचकता नहीं। लोभ उससे क्या पाप नहीं करवा डालता ? इसी से इस लोभ की वृत्ति को यहाँ ‘रक्षः व मृधः' शब्दों से स्मरण किया है ।

२. हे जीव! तू (वृत्रस्य) = ज्ञान के ऊपर पर्दा [आवरण] डाल देनेवाले इस वृत्र वा काम के (हनू) - जबड़ों को (रुज) = तोड़ डाल । काम की शक्ति को नष्ट कर दे । काम तुझपर प्रबल न हो जाए। ३. (वृत्रहन्) = काम का हनन करनेवाले ! (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! अब तू (अमित्रस्य) = स्नेह के अभावरूप द्वेष के, (अभिदासतः) = जो तुझे सब ओर से अन्दर व बाहर से उपक्षीण [दसु-क्षये destroy] करता है, इस द्वेष से उत्पन्न (मन्युम्) = क्रोध को (विजहि) = पूर्णरूप से नष्ट कर ।

मनुष्य में संकुचित हृदयता के कारण ईर्ष्या-द्वेष की भावना उत्पन्न हो जाती है । उत्पन्न होकर यह मनुष्य को नाश की ओर ले जाती है । वह अन्दर - ही - अन्दर जलता रहता है – क्षीणशक्ति हो जाने से या शक्ति के दुरुपयुक्त होने से वह ऐहलौकिक उन्नति भी नहीं कर पाता । एवं, यह ईर्ष्या उसे अन्दर-बाहर दोनों ओर से हानि पहुँचाती है। क्रोध को जन्म देकर यह उसे जलाती चलती है और सदा अशान्त रखती है । यह द्वेष उत्पन्न इसलिए होता है कि हम औरों के प्रति स्नेह की भावना को जागरित नहीं करते । मन्त्र में इसे ' अमित्र' से उत्पन्न कहा है। सच्चा उपासक सभी से प्रेम करता है और ईर्ष्या का शिकार नहीं होता ।
Essence
हम प्रभु के सच्चे उपासक बनें। ‘लोभ, काम, क्रोध' से ऊपर उठें।
Subject
लोभ, काम व क्रोध का भङ्ग [ crushing ]