Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1847

1875 Mantra
Devata- वेनः Rishi- वेनो भार्गवः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऊ꣣र्ध्वो꣡ ग꣢न्ध꣣र्वो꣢꣫ अधि꣣ ना꣡के꣢ अस्थात्प्र꣣त्य꣢ङ्चि꣣त्रा꣡ बिभ्र꣢꣯द꣣स्या꣡यु꣢धानि । व꣡सा꣢नो꣣ अ꣡त्क꣢ꣳ सुर꣣भिं꣢ दृ꣣शे꣢ कꣳ स्वा३र्ण꣡ नाम꣢꣯ जनत प्रि꣣या꣡णि꣢ ॥१८४७॥

ऊ꣣र्ध्वः꣢ । ग꣡न्धर्वः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । ना꣡के꣢꣯ । अ꣣स्थात् । प्रत्य꣢ङ् । प्र꣣ति । अ꣢ङ् । चि꣣त्रा । बि꣡भ्र꣢꣯त् । अ꣣स्य । आ꣡यु꣢꣯धानि । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣡त्क꣢꣯म् । सु꣣रभि꣢म् । सु꣣ । रभि꣢म् । दृ꣣शे꣢ । कम् । स्वः꣢ । न । ना꣡म꣢꣯ । ज꣣नत । प्रिया꣡णि꣢ ॥१८४७॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्चित्रा बिभ्रदस्यायुधानि । वसानो अत्कꣳ सुरभिं दृशे कꣳ स्वा३र्ण नाम जनत प्रियाणि ॥

ऊर्ध्वः । गन्धर्वः । अधि । नाके । अस्थात् । प्रत्यङ् । प्रति । अङ् । चित्रा । बिभ्रत् । अस्य । आयुधानि । वसानः । अत्कम् । सुरभिम् । सु । रभिम् । दृशे । कम् । स्वः । न । नाम । जनत । प्रियाणि ॥१८४७॥

Samveda - Mantra Number : 1847
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(गन्धर्वः) = [गां वेदवाचं धरति] वेदवाणी का धारण करनेवाला यह [गाव इन्द्रियाणि] इन्द्रियों को संयम में रखनेवाला व्यक्ति, जिसके लिए गत मन्त्र में 'यमस्य योनौ'='संयम के स्थान में' इन शब्दों का प्रयोग हुआ था । यह ज्ञानी व संयमी पुरुष (ऊर्ध्वः) = संसार के विषयों से ऊपर उठा हुआ (अधिनाके) = मोक्ष-सुख में (अस्थात्) = स्थित होता है।

यह गन्धर्व (प्रत्यङ्) = अपने अन्दर (चित्रा) = अद्भुत (अस्य आयुधानि) = अपने अस्त्रों को (बिभ्रत्) = धारण करता है। ‘ज्ञान, कर्म व उपासना' ये तीन इसके अस्त्र हैं। इनका अद्भुतत्व यही है कि ये काम-क्रोधादि सब आसुर वृत्तियों का सुन्दरता व पूर्णता से समापन कर देते हैं। यह गन्धर्व तो इस प्रकार (अत्कम्) = कवच को (वसानः) = धारण किये हुए होता है । यह कवच इसे काम-क्रोधादि के आक्रमण से सदा सुरक्षित करता है और यह गन्धर्व उस (सुरभिम्) = सुन्दर-ही- सुन्दर, देदीप्यमान [Shining] (कम्) = सुखस्वरूप प्रभु को (दृशे) = देखने में समर्थ होता है और (स्वः न नाम) = स्वर्गलोक की भाँति [नाम इति वाक्यालंकारे] (प्रियाणि) = आनन्दों को (जनत) = उत्पन्न करता है ।

संक्षेप में संयमी, ज्ञानी पुरुष, 'ज्ञान, कर्म व उपासना' रूप आयुधों को धारण किये हुए मोक्ष सुख में स्थित होता है । वासनाओं से सुरक्षित करनेवाले कवच को धारण किये हुए वह उस सुन्दर, सुखमय प्रभु का दर्शन करता है और स्वर्गीय आनन्दों का अनुभव करता है।
Essence
संयमी जीवन से मैं प्रभुदर्शन का पात्र बनूँ और मोक्षसुख का अनुभव करूँ।
 
Subject
गन्धर्व की स्वर्ग-प्राप्ति