Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1842

1875 Mantra
Devata- वायुः Rishi- उलो वातायनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢द꣣दो꣡ वा꣢त ते गृ꣣हे꣢३꣱ऽमृ꣢तं꣣ नि꣡हि꣢तं꣣ गु꣡हा꣢ । त꣡स्य꣢ नो देहि जी꣣व꣡से꣢ ॥१८४२॥

य꣢त् । अ꣣दः꣢ । वा꣣त । ते । गृहे꣢ । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । नि꣡हि꣢꣯तम् । नि । हि꣣तम् । गु꣡हा꣢꣯ । त꣡स्य꣢꣯ । नः꣣ । धेहि । जीव꣡से꣢ ॥१८४२॥

Mantra without Swara
यददो वात ते गृहे३ऽमृतं निहितं गुहा । तस्य नो देहि जीवसे ॥

यत् । अदः । वात । ते । गृहे । अमृतम् । अ । मृतम् । निहितम् । नि । हितम् । गुहा । तस्य । नः । धेहि । जीवसे ॥१८४२॥

Samveda - Mantra Number : 1842
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वात) = प्रेरणे! (ते गृहे) = तेरे ग्रहण करने में (यत्) - जो (अदः) = वह (अमृतम्) = अमरता या अविनाश (गुहा-निहितम्) = छिपा हुआ सुरक्षित रखा है (तस्य) = उस अमरता को (जीवसे) = जीवन के लिए (नः) = हमें (धेहि) = धारण कराइए ।

जो भी व्यक्ति इस प्रेरणा का ग्रहण करता है वह सचमुच उस अमरता का ही ग्रहण कर रहा होता है जो इस प्रेरणा में सुरक्षितरूप से रक्खी हुई है। प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाला व्यक्ति कभी अधर्म की ओर नहीं झुकता । अधर्म ही वह वस्तु है जो मनुष्य का धारण न कर विनाश करती है । गिरानेवाली होने के कारण ही इसका नाम 'पातक' है । यह अघ- पाप सचमुच अघ- पीड़ा ही है। यह दुरित मनुष्य की बड़ी दुर्गति कर देता है। प्रेरणा इस विनाश, पतन, पीड़ा व दुर्गति से बचानेवाली है। इसी से 'इसमें अमृत छिपा है' ऐसा कहा गया है ।

इस प्रेरणा का सुनना जीवन का हेतु है और न सुनना ही मृत्यु का कारण है । जो व्यक्ति वातायन=प्रेरणा को ही अपना अयन बनाता है वह 'उल' होता है— जीवन के सब विघ्नों को भस्मसात् कर देनेवाला होता है ।
Essence
हम प्रभु - प्रेरणा को सुनें और अमरता का लाभ करें ।
Subject
प्रेरणा में अमरता निहित है