Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1839

1875 Mantra
Devata- आपः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीप आम्बरीषो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣢स्मा꣣ अ꣡रं꣢ गमाम वो꣣ य꣢स्य꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ जि꣡न्व꣢थ । आ꣡पो꣢ ज꣣न꣡य꣢था च नः ॥१८३९॥

त꣡स्मै꣢꣯ । अ꣡र꣢꣯म् । ग꣣माम । वः । य꣡स्य꣢꣯ । क्ष꣡या꣢꣯य । जि꣡न्व꣢꣯थ । आ꣡पः꣢꣯ । ज꣣न꣡य꣢थ । च꣣ । नः ॥१८३९॥

Mantra without Swara
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः ॥

तस्मै । अरम् । गमाम । वः । यस्य । क्षयाय । जिन्वथ । आपः । जनयथ । च । नः ॥१८३९॥

Samveda - Mantra Number : 1839
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(आपः) = हे ज्ञान-जलो ! (यस्य) = जिस रस के (क्षयाय) = निवास के कारण आप (जिन्वथ) = हमें प्राणित करते हो, हम (वः) = आपके (तस्मा) = उस रस के लिए (अरं गमाम) = पर्याप्त रूप से प्राप्त हों । वस्तुतः ज्ञान हममें जीवन का संचार करता है – इस ज्ञान से हम सदा अपने को उन्नत होता हुआ अनुभव करते हैं, अतः ज्ञान-जल के रस को हम जितना ही प्राप्त करें, उतना थोड़ा ही है । हे ज्ञान-जलो ! आप (नः) = हमें (च) = और जनयथा - विकसित करो। हम ज्ञान के द्वारा अपने जीवन का अधिक और अधिक विकास करनेवाले बनें । ज्ञान का क्रमिक विकास करके हम महान् बनते हैं और उस महान् प्रभु को प्राप्त अधिकारी होते हैं ।
Essence
ज्ञान-जल हमें प्राणित करें और जीवन विकास करने में सक्षम करें ।
Subject
ज्ञान का परिणाम 'विकास'