Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1835

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शि꣡क्षे꣢यमस्मै꣣ दि꣡त्से꣢य꣣ꣳ श꣡ची꣢पते मनी꣣षि꣡णे꣢ । य꣢द꣣हं꣡ गोप꣢꣯तिः꣣ स्या꣢म् ॥१८३५॥

शि꣡क्षे꣢꣯यम् । अ꣣स्मै । दि꣡त्से꣢꣯यम् । श꣡ची꣢꣯पते । श꣡ची꣢꣯ । प꣣ते । मनीषि꣡णे꣢ । यत् । अ꣣ह꣢म् । गो꣡प꣢꣯तिः । गो । प꣣तिः । स्या꣢म् ॥१८३५॥

Mantra without Swara
शिक्षेयमस्मै दित्सेयꣳ शचीपते मनीषिणे । यदहं गोपतिः स्याम् ॥

शिक्षेयम् । अस्मै । दित्सेयम् । शचीपते । शची । पते । मनीषिणे । यत् । अहम् । गोपतिः । गो । पतिः । स्याम् ॥१८३५॥

Samveda - Mantra Number : 1835
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उल्लिखित उपालम्भ को दुहराता हुआ ही यह 'गोषूक्ति' कहता है- हे (शचीपते) = [शची=१. वाणी, २. शक्ति] वाणियों के पति, शक्तिशाली प्रभो ! (यत्) = यदि (अहम्) = मैं (गोपतिः) = वेदवाणियों का पति (स्याम्) = होऊँ तो (अस्मै) = इस (मनीषिणे) = मन का शासन करनेवाले बुद्धिमान् के लिए (शिक्षेयम्) = इन वाणियों का अवश्य शिक्षण करूँ [शिक्ष= to teach], (दित्सेयम्) = अवश्य देने की इच्छा करूँ । यह तो है ही नहीं कि आप वेदवाणियों के पति न हों, यह भी नहीं कि आपमें सामर्थ्य न हो । यही हो सकता है कि मेरे मनीषित्व में कुछ कमी हो । वस्तुतः मन का शासन किये बिना ज्ञान की प्राप्ति सम्भव भी तो नहीं, परन्तु हे प्रभो ! मुझे मनीषी बनने की शक्ति भी तो आपको ही देनी है। आपकी कृपा से मैं मनीषी बनूँ, जिससे आप मुझे वेदवाणी देने की इच्छा करें।
Essence
मनीषी ही ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी है। हम मनीषी=मन के शासक बनें और वेदज्ञान को प्राप्त करें ।
Subject
मनीषी ही ज्ञान का अधिकारी है