Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1830

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मृगः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गा꣣यत्रं꣡ त्रैष्टु꣢꣯भं꣣ ज꣢ग꣣द्वि꣡श्वा꣢ रू꣣पा꣢णि꣣ स꣡म्भृ꣢ता । दे꣣वा꣡ ओका꣢꣯ꣳसि चक्रि꣣रे꣢ ॥१८३०

गा꣣यत्र꣢म् । त्रै꣡ष्टु꣢꣯भम् । त्रै । स्तु꣣भम् । ज꣡ग꣢꣯त् । वि꣡श्वा꣢꣯ । रू꣣पा꣡णि꣢ । स꣡म्भृ꣢꣯ता । सम् । भृ꣣ता । देवाः꣢ । ओ꣡का꣢꣯ꣳसि । च꣣क्रिरे꣢ ॥१८३०॥

Mantra without Swara
गायत्रं त्रैष्टुभं जगद्विश्वा रूपाणि सम्भृता । देवा ओकाꣳसि चक्रिरे ॥१८३०

गायत्रम् । त्रैष्टुभम् । त्रै । स्तुभम् । जगत् । विश्वा । रूपाणि । सम्भृता । सम् । भृता । देवाः । ओकाꣳसि । चक्रिरे ॥१८३०॥

Samveda - Mantra Number : 1830
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
ऋग्वेद का नाम यहाँ‘गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्' दिया गया है, क्योंकि इसमें इन्हीं छन्द के मन्त्रों की प्रधानता है। ऋग्वेद में कुल ३,९४,२२१ अक्षर हैं, जिनमें ३,१०,३८२ अक्षर इन तीन छन्दों के हैं, शेष ८३,८४१ अक्षर अन्य छन्दों के हैं। इससे ऋग्वेद का यह नाम उपयुक्त ही है । ७७ प्रतिशत मन्त्र इन्हीं छन्दों के हैं, शेष कुल मन्त्र २३ प्रतिशत हैं। अक्षरों के दृष्टि से तो ७८ प्रतिशत अक्षर इन्हीं छन्दों में हैं, शेष कुल २२ प्रतिशत हैं ।

ऋग्वेद विज्ञानवेद है इसमें (विश्वा रूपाणि संभृता) = सब आकृतिमान् पदार्थों का संग्रह है। इसमें तृण से लेकर सूर्यपर्यन्त सभी पदार्थों का ज्ञान दिया गया है । ११ पृथिवीस्थ, ११ अन्तरिक्षस्थ व ११ द्युलोकस्थ तेतीस के तेतीस (देवा:) = देवताओं ने इस ऋग्वेद में (ओकांसि) = अपने घरों को (चक्रिरे) = बनाया है, अर्थात् सभी देवों का इसमें प्रतिपादन है । इस विज्ञानवेद के अध्ययन से ही हम इन सब प्राकृतिक देवों को अच्छी प्रकार समझ सकेंगे, इन्हें ठीक-ठीक समझकर इनका सदुपयोग कर पाएँगे और हमारा यह शरीर भी 'देवानां पू:'-देवनगरी बन सकेगा।

इन देवों के ज्ञान से ही इनके अधिष्ठाता महादेव का ज्ञान होता है और इस प्रकार प्रभु के ज्ञान के लिए भी वेदों का अध्ययन नितान्त आवश्यक है।

हम 'ऋग्, यजुः व साम' इन तीनों प्रकार के मन्त्रों का अध्ययन करें, जिससे हमारे जीवन में पूर्णता आ सके । विज्ञानपूर्वक होने से हमारे कर्म उत्तम हों और प्रभु-स्मरण से अहंकारशून्य हों । तीन ही प्रकार के ये मन्त्र हैं । ये ही तीन प्रकार के मन्त्र ' अथर्ववेद' में भी हैं । भिन्न प्रकार के मन्त्र न होने से अथर्व का अलग उल्लेख नहीं किया गया है ।
Essence
मैं उन ऋचाओं का अध्ययन करूँ, जिनमें पदार्थमात्र का ज्ञान दिया गया है। 
Subject
देवों का निवास स्थान
Footnote
नोट—‘देवों ने इसमें निवास किया है' वाक्य का अभिप्राय यह है कि इसमें सारे पदार्थों का ज्ञान दिया गया है और ‘रूपाणि संभृता' से ऐसा स्पष्ट है कि वस्तुओं के निर्माण का- उन्हें रूप देने का भी इसमें ज्ञान दिया गया है ।