Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1829

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मृगः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु꣣ञ्जे꣡ वाच꣢꣯ꣳ श꣣त꣡प꣢दीं꣣ गा꣡ये꣢ स꣣ह꣡स्र꣢वर्तनि । गा꣣यत्रं꣡ त्रैष्टु꣢꣯भं꣣ ज꣡ग꣢त् ॥१८२९

यु꣣ञ्जे꣢ । वा꣡च꣢꣯म् । श꣣त꣡प꣢दीम् । श꣣त꣢ । प꣣दीम् । गा꣡ये꣢꣯ । स꣣ह꣡स्र꣢वर्तनि । स꣣ह꣡स्र꣢ । व꣣र्तनि । गायत्र꣡म् । त्रै꣡ष्टु꣢꣯भम् । त्रै । स्तु꣣भम् । ज꣡ग꣢꣯त् ॥१८२९॥

Mantra without Swara
युञ्जे वाचꣳ शतपदीं गाये सहस्रवर्तनि । गायत्रं त्रैष्टुभं जगत् ॥१८२९

युञ्जे । वाचम् । शतपदीम् । शत । पदीम् । गाये । सहस्रवर्तनि । सहस्र । वर्तनि । गायत्रम् । त्रैष्टुभम् । त्रै । स्तुभम् । जगत् ॥१८२९॥

Samveda - Mantra Number : 1829
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का ‘मृग’ निश्चय करता है कि मैं शतपदीं वाचं युञ्जे- शतपदी वाणी का प्रयोग करता हूँ, अर्थात् अपने सारे क्रियाकलाप को इस कर्मवेद [यजुर्वेद] के अनुसार बनाता हूँ । मेरा सारा जीवन इसके निर्देशों का प्रयोग ही बन जाएगा। इसके शतपथ ही मेरे जीवन के शतवर्षों के पथ होंगे और साथ ही 'इन कर्मों को करते हुए, इनमें सफलता का लाभ करते हुए मुझे कहीं मिथ्याभिमान न हो जाए' मैं (सहस्रवर्तनि) = सहस्रों मार्गोंवाली – हज़ारों प्रकार से गायन की जानेवाली इस प्रभु की उपासनामयी सामवाणी का (गाये) = गायन करता हूँ | यह गायन मुझे सदा प्रभु का स्मरण कराता है और कर्मों में सिद्धि के मिथ्याभिमान से बचाता है ।

(सामवेद) - उपासना वेद है । इसमें प्रभु का सतत गायन है। यह प्रभु-स्मरण ‘मृग'=आत्मान्वेषक को कर्तृत्व के अहंकार से बचानेवाला होता है ।

यह प्रभु का गायन करता है और साथ ही (गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्) = गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती छन्द के मन्त्रों से भरे हुए ऋग्वेद - विज्ञानवेद का भी अध्ययन करता है। कर्मों की उत्तमता के लिए ‘विज्ञान' आवश्यक ही है । ज्ञानपूर्वक होनेवाला कर्म कुशल कर्म होता है—अन्यथा वह अनाड़ीपन से किया जाकर हमें असफल व अपवित्र करता है ।

ऋग्वेद को यहाँ ‘गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्' इसलिए कहा है कि ऋग्वेद के १०५२२ मन्त्रों में गायत्री छन्द के २४४९ मन्त्र हैं, त्रिष्टुप् के ४२५१ तथा जगती के १३४६ । इस प्रकार ८०४६ मन्त्र ‘गायत्री, त्रिष्टुप् व जगती छन्द के हैं और शेष १३ छन्दों के मिलकर कुल २४७६ मन्त्र हैं। इस प्रकार गायत्र्यादि की मुख्यता के कारण ऋग्वेद का स्मरण ‘गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्' शब्दों से किया है। इसका गायन भी आवश्यक है, क्योंकि विज्ञान के बिना कर्म कभी ठीक हो ही नहीं सकता। 
Essence
१. यजु के अनुसार कर्म करना, २. साम द्वारा प्रभु का गायन करना जिससे कर्मों का गर्व न हो और ३. ऋग्वेद का अध्ययन करना जिससे हमारे कर्मों में ज्ञानाभाव से अनाड़ीपन न आ जाए।
Subject
सहस्रवर्तनि वाणी का गायन
Footnote
नोट – सामवेद माना भी 'सहस्रवर्त्मा' ही जाता है ।