Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1822

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्र꣡ सो अ꣢꣯ग्ने꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ सु꣣वी꣡रा꣢भिस्तरति꣣ वा꣡ज꣢कर्मभिः । य꣢स्य꣣ त्व꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मावि꣢꣯थ ॥१८२२॥

प्रः꣢ । सः । अ꣣ग्ने । त꣡व꣢꣯ । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ । सु꣣वी꣡रा꣢भिः । सु꣣ । वी꣡रा꣢꣯भिः । त꣣रति । वा꣡ज꣢꣯कर्मभिः । वा꣡ज꣢꣯ । क꣣र्मभिः । य꣡स्य꣢꣯ । त्वम् । स꣣ख्य꣢म् । स꣣ । ख्य꣢म् । आ꣡वि꣢꣯थ ॥१८२२॥

Mantra without Swara
प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः । यस्य त्वꣳ सख्यमाविथ ॥

प्रः । सः । अग्ने । तव । ऊतिभिः । सुवीराभिः । सु । वीराभिः । तरति । वाजकर्मभिः । वाज । कर्मभिः । यस्य । त्वम् । सख्यम् । स । ख्यम् । आविथ ॥१८२२॥

Samveda - Mantra Number : 1822
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) = सब प्रकार से अग्रगति के साधक प्रभो ! (यस्य) = जिसके (त्वम्) = आप (सख्यम्) = मैत्रीभाव को (आविथ) = प्राप्त होते हो (सः) वह व्यक्ति (तव) = आपकी (सुवीराभिः) = उत्तम वीर बनानेवाले तथा (वाजकर्मभिः) = शक्तिशाली कर्मोंवाले (ऊतिभिः) = रक्षणों से (प्रतरति) = भवसागर को तैर जाता है । 

जब जीव प्रभु को सदा अपनी आँखों के सामने रखने का प्रयत्न करते हैं तब वे प्रभु की मित्रता को प्राप्त करते हैं। प्रभु की मित्रता को प्राप्त करनेवाले इन व्यक्तियों को कभी कायरता नहीं छूतीप्रभु के रक्षण में कायरता का क्या काम ? पिता की गोद में स्थित बच्चा कभी घबराता नहीं, तो क्या उस अमर प्रभु से सर्वतोवेष्टित यह प्रभुभक्त कभी घबराएगा? इस प्रभुभक्त के कर्म शक्तिसम्पन्न होते हैं। इसने प्रभुस्तवन के द्वारा प्रभु के अधिक और अधिक निकट होते हुए, कण-कण करके बड़े उत्तम प्रकार से [सु] अपने में शक्ति को भरा है [भर], इसी से इसका नाम 'काण्व सोभरि' पड़ गया है। वस्तुत: प्रभु की मित्रता से जीव अपनी शक्ति को उत्तरोत्तर बढ़ाता चलता है। यह शक्ति ही इसे इस जीवन-यात्रा में सफल करती है ।
Essence
मैं प्रभु का मित्र बनकर भवसागर को तैर जाऊँ ।
Subject
संसार सागर से तर जाता है