Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1815

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhand- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स꣢꣫ हि पु꣣रू꣢ चि꣣दो꣡ज꣢सा वि꣣रु꣡क्म꣢ता꣣ दी꣡द्या꣢नो꣣ भ꣡व꣢ति द्रु꣢ह꣣न्त꣡रः प꣢र꣣शु꣡र्न द्रु꣢꣯हन्त꣣रः꣢ । वी꣣डु꣢ चि꣣द्य꣢स्य꣣ स꣡मृ꣢तौ꣣ श्रु꣢व꣣द्व꣡ने꣢व꣣ य꣢त्स्थि꣣र꣢म् । नि꣣ष्ष꣡ह꣢माणो यमते꣣ ना꣡य꣢ते धन्वा꣣स꣢हा꣣ ना꣡य꣢ते ॥१८१५॥

सः । हि । पु꣣रु꣢ । चि꣣त् । ओ꣡ज꣢꣯सा । वि꣣रु꣡क्म꣢ता । वि꣣ । रु꣡क्म꣢꣯ता । दी꣡द्या꣢꣯नः । भ꣡व꣢꣯ति । द्रु꣣हन्तरः꣢ । द्रु꣣हम् । तरः꣢ । प꣣रशुः꣢ । न । द्रु꣣हन्तरः꣢ । द्रु꣣हम् । तरः꣢ । वी꣣डु꣢ । चि꣣त् । य꣡स्य꣢꣯ । स꣡मृतौ꣢꣯ । सम् । ऋ꣣तौ । श्रु꣡व꣢꣯त् । व꣡ना꣢꣯ । इ꣣व । य꣢त् । स्थि꣣र꣢म् । नि꣣ष्ष꣡ह꣢माणः । निः꣣ । स꣡ह꣢꣯मानः । य꣣मते । न꣢ । अ꣣यते । धन्वास꣡हा꣢ । ध꣣न्व । स꣡हा꣢꣯ । न꣢ । अ꣣यते ॥१८१५॥

Mantra without Swara
स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः । वीडु चिद्यस्य समृतौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम् । निष्षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते ॥

सः । हि । पुरु । चित् । ओजसा । विरुक्मता । वि । रुक्मता । दीद्यानः । भवति । द्रुहन्तरः । द्रुहम् । तरः । परशुः । न । द्रुहन्तरः । द्रुहम् । तरः । वीडु । चित् । यस्य । समृतौ । सम् । ऋतौ । श्रुवत् । वना । इव । यत् । स्थिरम् । निष्षहमाणः । निः । सहमानः । यमते । न । अयते । धन्वासहा । धन्व । सहा । न । अयते ॥१८१५॥

Samveda - Mantra Number : 1815
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सः) = यह परुच्छेप (हि) = निश्चय से (विरुक्मता) = विशेष दीप्तिवाले (ओजसा) = ओज से (दीद्यान:) = चमकता हुआ (पुरुचित्) = बहुत बड़ी भी अथवा अपना पालन व पोषण करनेवाली (द्रुहम्) = द्रोह की भावना को (तरः) = तैरनेवाला होता है । यह परुच्छेप किसी व्यक्ति को नष्ट करके अपना महान् पोषण हो सकने पर भी द्रोह–जिघांसा की वृत्ति को तैर जाता है। परुच्छेप तो (परशुः न) = जैसे कुल्हाड़ा वृक्ष का काटनेवाला होता है, इसी प्रकार (द्रुहन्तरः) = द्रुहन्तर होता है - द्रोह की भावना को तैर जानेवाला होता है। २. यह परुच्छेप वह होता है यस्य जिसकी (समृतौ) = सङ्गति में (यत्) = जो वीडु (चित्) = अत्यन्त बलवान् भी (स्थिरम्) = स्थिर हृदय है वह भी वना इव जलों की भाँति (श्रुवत्) = सुनाई पड़ता है । परुच्छेप के सम्पर्क में कठोर-से-कठोर हृदय भी पिघल जाता है और दयार्द्र हो उठता है । यह परुच्छेप स्वयं तो जिघांसा की वृत्ति से ऊपर उठा हुआ होता ही है, यह अपने सम्पर्क में आनेवाले दूसरे कठोर हृदय पुरुष को भी दयार्द्र व कोमल कर देता है ।

३. (नि:षहमाणः न अयते) = सब बुरी वृत्तियों का पराभव-सा करता हुआ यह अपने जीवन में गति करता है । (धन्वासहा न अयते) = अपने धनुष से शत्रुओं का पराभव करनेवाले के समान यह गति करता है। प्रणव-ओम् ही इसका धनुष है - इस प्रणवरूप धनुष के द्वारा यह कामादि सब शत्रुओं का पराभव कर डालता है । (यमते) = यह अपने जीवन में काम, क्रोध, लोभ–सभी का नियमन करके चलता है। ये कामादि उसपर प्रभुत्व नहीं करते, अपितु परुच्छेप ही इन्हें अपने वश में रखता है। 
Essence
परुच्छेप के जीवन में निम्न तीन बातें होती हैं— १. यह द्रोह की भावना से ऊपर होता है । २. स्वयं दयार्द्र होता हुआ औरों को भी दयार्द्र बनाता है । ३. काम, क्रोध, लोभ को वश में रखता है ।
Subject
परुच्छेप के जीवन की तीन बातें