Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1810

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣न्द꣢य꣣न्नि꣡न्द्रा꣢य꣣ म꣡धु꣢मत्तमः ॥१८१०॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । मन्द꣡य꣢न् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣡धु꣢꣯मत्तमः ॥१८१०॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम मन्दयन्निन्द्राय मधुमत्तमः ॥

पवस्व । सोम । मन्दयन् । इन्द्राय । मधुमत्तमः ॥१८१०॥

Samveda - Mantra Number : 1810
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘जमदग्निः भार्गवः' इन मन्त्रों का ऋषि है – जिसकी जाठराग्नि ठीक भक्षण [जमु अदने ] करनेवाली है और जो बड़ा तेजस्वी है । यह गतमन्त्र के 'सोमी' आचार्य से सोमरक्षा का महत्त्व समझता है और इस सुरक्षित सोम के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहता है किहे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू १. (मधुमत्तमः) = जीवन में सर्वाधिक माधुर्य को लानेवाली है। वस्तुतः सोम इस शरीर में अत्यन्त सारभूत वस्तु है। इस सोम का अपव्यय होने पर मनुष्य निर्बल व चिड़चिड़ा हो जाता है—इसके जीवन में से माधुर्य जाता रहता है । २. (मन्दयन्) = तू अपनी रक्षा करनेवाले को हर्षित करता है। सोम के सुरक्षित होने पर मनुष्य जीवन में उल्लास का अनुभव करता है । ३. हे सोम तू (इन्द्राय पवस्व) = इस सोमपान करनेवाले, इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव को पवित्र बना । सोम की रक्षा से मनुष्य की प्रवृत्ति पाप की ओर न होकर जीवन में पवित्रता का संचार होता है । ४. (ते) = ये (सुतासः) = उत्पन्न हुए-हुए सोम (विपश्चितः) = मनुष्य को सूक्ष्म बुद्धिवाला बनाते हैं, जिससे वह प्रत्येक पदार्थ को विशेष सूक्ष्मता से देखता हुआ चिन्तनशील बनता है।५. (शुक्राः) = [शुच दीप्तौ] ये सोम जीवन को अधिक और अधिक उज्वल बनाते हैं । इनसे जीवन में दीप्ति का संचार होता है । ‘शरीर, मन व बुद्धि' सभी इससे चमक उठते हैं । ६. (वायुम् असृक्षत) = ये जीव को [वा गतौ] बड़ा गतिशील बनाते हैं। इनके अभाव में मनुष्य अकर्मण्य बन जाता है । ७. ये सोम (वाजयन्तः) = मनुष्य को शक्तिशाली बनानेवाले हैं । वस्तुतः सम्पूर्ण शक्ति के मूल ये ही हैं । मूल क्या ? ये ही तो शक्ति हैं । ८. (रथाः इव) = ये जीवन-यात्रा को पूर्ण करने के लिए रथ के समान हैं। इनके अभाव में जीवन नहीं — मृत्यु है। जीवन ही नहीं तो जीवन यात्रा की पूर्ति का तो प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता । ९. ये जीवन-यात्रा को पूर्ण करके (देववीतये) = उस प्रभु को प्राप्त करने के लिए (असृग्रन्) = रचे गये हैं सोम-सृजन का मुख्य उद्देश्य प्रभु-प्राप्ति है। ये सुरक्षित होकर, मनुष्य की ऊर्ध्वगति के द्वारा, उसे ब्रह्म के समीप पहुँचाते हैं । इन सोमों से उस सोम [परमात्मा] को ही तो प्राप्त करना है। 
Essence
मैं संयमी आचार्य से शिक्षित हो संयमी जीवनवाला बनूँ। जीवन के संयम से प्रभु का संयम [अपने में बाँधनेवाला] करनेवाला होऊँ ।
Subject
जीवन के संयम से प्रभु का संयम