Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 181

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ तू꣢꣯ न इन्द्र वृत्रहन्न꣣स्मा꣢क꣣म꣢र्ध꣣मा꣡ ग꣢हि । म꣣हा꣢न्म꣣ही꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥१८१॥

आ꣢ । तु । नः꣣ । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अस्मा꣡क꣢म् । अ꣡र्ध꣢꣯म् । आ । ग꣣हि । महा꣢न् । म꣣ही꣡भिः꣢ । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ ॥१८१॥

Mantra without Swara
आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्धमा गहि । महान्महीभिरूतिभिः ॥

आ । तु । नः । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अस्माकम् । अर्धम् । आ । गहि । महान् । महीभिः । ऊतिभिः ॥१८१॥

Samveda - Mantra Number : 181
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोम की रक्षा के द्वारा जीवात्मा सचमुच 'इन्द्र' बनता है । इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनकर ही वह सोम की रक्षा कर पाता है। ज्ञान के आवरणभूत कामादि वासनाओं का संहार करके यह ‘वृत्रहन्’ बना है। कामादि ही वृत्र हैं - ये ज्ञान को आवृत कर देते हैं। इन्द्र इस वृत्र का विनाश करनेवाला है। इस जीव से प्रभु कहते हैं कि हे (इन्द्र) = इन्द्र ! (वृत्रहन्) = हे वृत्रहन्! तू (तु)= निश्चय से (आ नः) = सर्वथा हमारा है। वह विलास की ओर न जाकर वीर्य - रक्षा के लिए सतत प्रयत्नशील हुआ है, अतः प्रभु का तो यह है ही। यह प्रकृति की ओर नहीं झुका। इसे प्रभु कहते हैं कि (अस्माकम् अर्धम्) = हमारे ऐश्वर्य को (आगहि) = तू सर्वथा प्राप्त हो । ऋधु वृद्धौ धातु से बनकर ‘अर्ध' शब्द ऋद्धि, समृद्धि व ऐश्वर्य का वाचक है।

जो व्यक्ति अपने को प्राकृतिक भोगों के प्रति नहीं दे डालता, वह दिव्य ऐश्वर्य को तो प्राप्त करता ही है- उसके अन्दर दिव्यता [Divinity] का अवतरण होता है। इस दिव्यता के अवतरण से ही वह 'वामदेव' = उत्तम दिव्य गुणोंवाला कहलाता है और प्रशस्त इन्द्रियोंवाला होने से वह 'गोतम' होता है।

इस मन्त्र के ऋषि ‘वामदेव गोतम' से प्रभु कहते हैं कि (महीभिः ऊतिभिः) =महनीय रक्षणों के द्वारा ही तू (महान्) = बड़ा बना है। जब जीव प्रलोभनों से प्रलुब्ध न होकर वासनाओं को विनष्ट कर डालता है, तभी वह महान् बनता है, तभी वह प्रभु का होता है और प्रभु के ऐश्वर्यांश को प्राप्त करनेवाला होता है।
Essence
हम इन्द्र बनें - जितेन्द्रिय हों और वासनाओं के आक्रमण से अपनी रक्षा कर महान् बनें।
Subject
प्रभु के ऐश्वर्य को प्राप्त कर