Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1809

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नीपातिथिः काण्वः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ ग्रा꣢वा꣣ व꣡द꣢न्नि꣣ह꣢ सो꣣मी꣡ घोषे꣢꣯ण वक्षतु । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०९॥

आ꣢ । त्वा꣣ । ग्रा꣡वा꣢꣯ । व꣡द꣢꣯न् । इ꣣ह꣢ । सो꣣मी꣢ । घो꣡षे꣢꣯ण । व꣣क्षतु । दि꣣वः꣢ । अ꣣मु꣡ष्य꣢ । शा꣡स꣢꣯तः । दि꣡व꣢꣯म् । य꣣य꣢ । दि꣣वावसो । दिवा । वसो ॥१८०९॥

Mantra without Swara
आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण वक्षतु । दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो ॥

आ । त्वा । ग्रावा । वदन् । इह । सोमी । घोषेण । वक्षतु । दिवः । अमुष्य । शासतः । दिवम् । यय । दिवावसो । दिवा । वसो ॥१८०९॥

Samveda - Mantra Number : 1809
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु कहते हैं कि हे नीपातिथे ! [तत्त्वज्ञान की प्राप्ति की इच्छावाले जीव !] (त्वा) = तुझे (सोमी) = सोमशक्ति का [वीर्य-शक्ति का] अपने में संयम करनेवाला (ग्रावा) = विद्वान् [विद्वांसो हि ग्रावाण: श० ३.९.३.१४] (आवदन्) = ज्ञान-विज्ञान का उपदेश देता हुआ (घोषेण) = वेदमन्त्रों के उच्चारण से (इह) = इस प्रकाशमय लोक में (वक्षतु) = प्राप्त कराए । = आचार्य को विद्वान् तो होना ही चाहिए, विद्वत्ता के साथ उसका ब्रह्मचारी संयमी जीवनवाला होना भी आवश्यक है । वह व्यापक ज्ञान को प्राप्त करानेवाला हो [आ] । वेदमन्त्रों के उच्चारण से आचार्य विद्यार्थी को ज्ञान देता है और उसे प्रकाशमय लोक में प्राप्त कराता है । = जीव का यही मौलिक कर्त्तव्य है कि वह 'दिवावसु' - ज्ञान धनवाला बने और उस प्रकाशमय ब्रह्माण्ड के शासक प्रभु के प्रकाशमय लोक को प्राप्त करे। 
Essence
हम संयमी विद्वान् के शिष्य बनें ।
 
Subject
संयमी विद्वान् का उपदेश