Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1800

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
भू꣢रि꣣ हि꣢ ते꣣ स꣡व꣢ना꣣ मा꣡नु꣢षेषु꣣ भू꣡रि꣢ मनी꣣षी꣡ ह꣢वते꣣ त्वा꣢मित् । मा꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्म꣢घव꣣ञ्ज्यो꣡क्कः꣢ ॥१८००॥

भू꣡रि꣢꣯ । हि । ते꣢ । स꣡व꣢꣯ना । मा꣡नु꣢꣯षेषु । भू꣡रि꣢꣯ । म꣣नीषी꣢ । ह꣣वते । त्वा꣢म् । इत् । मा । आ꣣रे꣢ । अ꣢स्म꣢त् । म꣣घवन् । ज्यो꣢क् । क꣣रि꣡ति꣢ ॥१८००॥

Mantra without Swara
भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित् । मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः ॥

भूरि । हि । ते । सवना । मानुषेषु । भूरि । मनीषी । हवते । त्वाम् । इत् । मा । आरे । अस्मत् । मघवन् । ज्योक् । करिति ॥१८००॥

Samveda - Mantra Number : 1800
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे प्रभो ! (ते) = आपके (मानुषेषु) = मनुष्यों के निमित्त (सवना) = उत्पादन (हि) = निश्चय से (भूरि) = अनन्त हैं। आपने मनुष्यों के हित के लिए अनन्त वस्तुओं का निर्माण किया है। मनुष्य से उनका परिगणन क्या सम्भव हो सकता है ?

। २. इसलिए (मनीषी) = बुद्धिमान् पुरुष (त्वामित्) = आपको ही (भूरि) = बार-बार (हवते) = पुकारता है वह समझता है कि आप ही वस्तुतः उसका कल्याण करनेवाले हैं। सच्चे माता-पिता, भाई व बन्धु तो आप ही हैं। आपको पाया तो सभी कुछ पा लिया । आपको खोया तो वस्तुतः सर्वस्व ही खो दिया। ऐसा समझता हुआ यह कहता है कि

३. हे (मघवन्) - सब ऐश्वर्यों के स्वामिन् प्रभो ! अब तो आप (अस्मत् आरे) = हमसे दूर (मा ज्योक् कः) = देर तक निवास मत कीजिए। मैं आपके सन्दर्शन में होऊँ, आपकी कृपा-दृष्टि मुझपर पड़े । मैं आपको अपने से ओझल न करूँ और आपकी कृपादृष्टि का पात्र बनूँ ।
Essence
हे प्रभो ! आपके उपकार अनन्त हैं। मैं सदा आपको पुकारूँ और अपने को आपके समीप पाऊँ। मुझे तो तभी शान्ति होगी-तभी मेरी प्यास बुझेगी।
Subject
भक्त की प्रभु-प्राप्ति के लिए आतुरता