Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 18

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
औ꣣र्वभृगुव꣡च्छुचि꣢꣯मप्नवान꣣व꣡दा हु꣢꣯वे । अ꣣ग्नि꣡ꣳ स꣢मु꣣द्र꣡वा꣢ससम् ॥१८॥

औ꣣र्वभृगुव꣢त् । औ꣣र्व । भृगुव꣢त् । शु꣡चि꣢꣯म् । अ꣣प्नवानव꣢त् । आ । हु꣣वे । अग्नि꣢म् स꣣मुद्र꣡वा꣢ससम् । स꣣मुद्र꣢ । वा꣣ससम् ॥१८॥

Mantra without Swara
और्वभृगुवच्छुचिमप्नवानवदा हुवे । अग्निꣳ समुद्रवाससम् ॥

और्वभृगुवत् । और्व । भृगुवत् । शुचिम् । अप्नवानवत् । आ । हुवे । अग्निम् समुद्रवाससम् । समुद्र । वाससम् ॥१८॥

Samveda - Mantra Number : 18
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र में कहा है कि और्व की भाँति, भृगु की भाँति और अप्नवान् की भाँति शुचि, अग्नि और समुद्रवासस् प्रभु को आहुवे - आह्वयामि = पुकारता हूँ। वैदिक संस्कृति में एक नियम है–उपासना का ठीक प्रकार यही है कि उपास्य जैसा बनने का यत्न किया जाए। ('विष्णुर्भूत्वा भजेद् विष्णुम्')= विष्णु बनकर ही विष्णु की उपासना की जाती है।
इसी नियम के अनुसार मन्त्र में प्रथम बात यह कही गयी है कि वे प्रभु (शुचिम्)= निर्मल हैं। उनकी उपासना और्व बनने से होगी। और्व शब्द का अर्थ है उरोरपत्यम्-उरु की सन्तान-विशाल का पुत्र अर्थात् अत्यन्त उदार हृदयवाला । 'शुचि' प्रभु का उपासक तो वही है जो विशाल हृदय रखता है, जिसके हृदय में अपकारियों के लिए भी स्थान है।
द्वितीय, उपासक ‘भृगु' है जो 'अग्नि' की उपासना करता है। प्रभु ज्ञानाग्नि के पुञ्ज हैं। उनकी उपासना आचार्य के समीप रहकर तपस्या की अग्नि में अपना परिपाक करके ज्ञानी बननेवाला भृगु [भ्रस्ज पाके] ही करता है।
तृतीय, उपासक ‘अप्नवान्' है जो ‘समुद्रवासस्' को अपना उपास्य बनाता है। ‘अप्न’ शब्द निघण्टु मे कर्मवाचक है, ‘वान्' का अर्थ कोश में Living= जीवन है। एवं Activity is Life=क्रिया ही जीवन है, इस तत्त्व को अपने जीवन में अनूदित करनेवाला व्यक्ति ‘अप्नवान्’ है। ‘वान्' शब्द का अर्थ weaving = बुनना भी है, अतः जिसका जीवन कर्मों के ताने-बाने से बुने वस्त्र के समान है वही 'अप्नवान्' है। यही ‘समुद्रवासस्' प्रभु का उपासक है। मुद्-हर्ष। स=सहित । सदा आनन्द के साथ निवासवाले वे प्रभु समुद्रवासस् हैं। वे वस्तुतः आनन्दमय हैं। (‘स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च')= क्रिया उनका स्वभाव है, यही उनकी आनन्दमयता का रहस्य है। मनुष्य भी अप्नवान् = क्रियामय जीवनवाला बनकर आनन्द में

निवास कर सकता है। अप्नवान् से पूर्व भृगु का उल्लेख ज्ञानपूर्वक क्रिया का संकेत कर रहा है। हम ज्ञानी बनकर कर्म करें, यही आनन्द प्राप्ति का साधन है। उस समय हमारे सब कर्म उदार व पवित्र होंगे, उनमें शुचिता होगी और उनका परिणाम वास्तविक आनन्द का लाभ होगा।
Essence
हम विशाल हृदय बनें, तपस्या में अपना परिपाक कर ज्ञान का संचय करें तथा क्रियाशीलता को ही जीवन समझें। इसी प्रकार हम इस मन्त्र के ऋषि 'प्रयोग' – उत्तम कर्मों में कुशलतावाले बनेंगे, या प्र= प्रकृष्ट, योग- उपासनावाले होंगे। ऐसा बनना ही प्रभु की सच्ची उपासना है।
Subject
तीन उपासक