Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1773

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्य꣢ ते महि꣣ना꣢ म꣣हः꣡ परि꣢꣯ ज्मा꣣य꣡न्त꣢मी꣣य꣡तुः꣢ । ह꣢स्ता꣣ व꣡ज्र꣢ꣳ हिर꣣ण्य꣡य꣢म् ॥१७७३॥

य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । महिना꣢ । म꣣हः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । ज्मा꣣य꣡न्त꣢म् । ई꣣य꣡तुः꣢ । ह꣡स्ता꣢꣯ । व꣡ज्र꣢꣯म् । हि꣣रण्य꣡य꣢म् ॥१७७३॥

Mantra without Swara
यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः । हस्ता वज्रꣳ हिरण्ययम् ॥

यस्य । ते । महिना । महः । परि । ज्मायन्तम् । ईयतुः । हस्ता । वज्रम् । हिरण्ययम् ॥१७७३॥

Samveda - Mantra Number : 1773
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रियमेध कहता है कि हे प्रभो ! मैं उन आपका स्मरण करता हूँ (महिना महः) = महिमा से महान् (यस्य ते) = जिस आपके (हस्ता) = हाथ (परिज्यायन्तम्) = चारों ओर सम्पूर्ण पृथिवी को अपनानेवाले (हिरण्ययम्) = ज्योतिर्मय (वज्रम्) = क्रियाशीलता को [वज गतौ] (ईयतुः) = प्राप्त होते हैं ।

प्रभु की महिमा महान् है । जितना- जितना मैं संसार में भ्रमण करता हूँ, उतना उतना आपकी महिमा से मेरा मन प्रभावित होता है। मेरी दृष्टि में आप अधिक और अधिक महान् होते जाते हैं । आपके हाथ निरन्तर क्रियाशील हैं— आपकी क्रिया स्वाभाविक है – वह किसी निजी प्रयोजन को लेकर नहीं हो रही । आपकी सारी क्रियाएँ जीवहित के लिए हैं। वे क्रियाएँ सारी पृथिवी को व्यापनेवाली हैं। उन क्रियाओं में बुद्धिमत्ता व प्रकाश झलक रहा है। आपकी क्रियाएँ सर्वव्यापक और प्रकाशमय हैं । आपकी एक-एक क्रिया आपकी महिमा को प्रकट कर रही है। आपकी एक-एक रचना को देखकर मैं आश्चर्य-निमग्न हो जाता हूँ। आपकी प्रत्येक रचना बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण प्रतीत होती है।
Essence
मैं आपकी रचना को बारीकी से देखूँ और आपकी महिमा का अनुभव करूँ । इस महिमा के दर्शन से प्रेरित होकर मैं भी अपनी क्रियाओं को व्यापक व प्रकाशमय बनाऊँ ।
Subject
व्यापक व प्रकाशमय क्रिया