Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1770

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधो वामदेवो वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣢ स्रु꣣त꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थ꣢꣫ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥१७७०॥

वि । स्रु꣣त꣡यः꣢ । य꣡था꣢꣯ । प꣣थः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वत् । य꣣न्तु । रात꣡यः꣢ ॥१७७०॥

Mantra without Swara
वि स्रुतयो यथा पथ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥

वि । स्रुतयः । यथा । पथः । इन्द्र । त्वत् । यन्तु । रातयः ॥१७७०॥

Samveda - Mantra Number : 1770
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में विषयों से बद्ध एक पुरुष अन्ततोगत्वा अपनी दुर्गति को अनुभव करता हुआ प्रभु से कहता है कि हे प्रभो! सब बलों के पति ‘शवसस्पति' तो आप ही हैं । आपसे दूर होकर मैं तो सब शक्ति खो बैठा हूँ — मेरे आनन्द की ज्योति भी बुझ । मुझे अब क्या करना चाहिए? मेरे उद्धार का मार्ग क्या है ? प्रभु उत्तर देते हैं कि -

(इन्द्र) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! तू यह मत भूल कि तू ‘इन्द्र' है—‘इन्द्रियों का अधिष्ठाता है, न कि दास'। अब तू ऐसा प्रयत्न कर कि (रातयः) = दान (त्वत्) = तुझसे यन्तु इस प्रकार चलें— प्रवाहित हों (यथा) = जैसे (पथ:) = मार्ग से (विस्स्रुतयः) = विविध पर्वतीय जल प्रवाह बहते हैं । ये जलप्रवाह किस प्रकार चट्टानों को भी कुरेद कर अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, उसी प्रकार तेरे ये दान-प्रवाह भी तेरे जीवन मार्ग में आई हुई इन विषय चट्टानों को कुरेद कर तुझे आगे बढ़ा ले-चलेंगे। दान का अर्थ देना ही तो नहीं है; देने के साथ 'दो अवखण्डने' से बनकर 'दान' शब्द खण्डन की भावना को भी व्यक्त करता है। ये दान तेरे बन्धनों का सचमुच खण्डन करेंगे । विषयवृक्ष के मूलभूत लोभ पर ही यह दान कुठाराघात करता है और 'दैप् शोधने' शुद्ध बना देता है। एवं, बन्धनों से बचने का या उत्पन्न बन्धनों के खण्डन का उपाय एक ही है – “दान'', अतः प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु की ओर से जीव को दान की प्रेरणा की गयी है । जितना - जितना हम इस प्रेरणा को सुनेंगे व अनुष्ठान में लाएँगे उतना-उतना ही बद्ध न रहकर ब्रह्मा बनने के लिए अग्रसर होंगे। 
Essence
मैं‘दान' का अविकल पाठ पढ़नेवाला बनूँ, जिससे बद्ध स्थिति से ब्रह्मा की स्थिति में पहुँच सकूँ।
Subject
बन्धनों का खण्डन