Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1769

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधो वामदेवो वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वा꣡मिच्छ꣢꣯वसस्पते꣣ य꣢न्ति꣣ गि꣢रो꣣ न꣢ सं꣣य꣡तः꣢ ॥१७६९॥

त्वा꣢म् । इत् । श꣣वसः । पते । य꣡न्ति꣢꣯ । गि꣡रः꣢꣯ । न । सं꣣य꣡तः꣢ । स꣣म् । य꣡तः꣢꣯ ॥१७६९॥

Mantra without Swara
त्वामिच्छवसस्पते यन्ति गिरो न संयतः ॥

त्वाम् । इत् । शवसः । पते । यन्ति । गिरः । न । संयतः । सम् । यतः ॥१७६९॥

Samveda - Mantra Number : 1769
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
ब्रह्मा का ठीक विपरीत-opposite बद्ध पुरुष है। ब्रह्मा उन्नति के शिखर पर है तो यह बद्ध पुरुष अवनति के गर्त मंच गिरा है। नाना प्रकार के विषयों ने इसे अपने जाल में जकड़ा हुआ है । यह दुनियाभर के विषयों का ध्यान करता है, परन्तु प्रभु का स्मरण नहीं करता । यह विषयों से बुरी तरह से जकड़ा जा चुका है, अत: 'संयत' हो गया है। इस (संयतः) = विषयों से बद्ध पुरुष की (गिरः) = वाणियाँ (त्वाम्) = हे प्रभो ! तेरे प्रति (इत्) = निश्चय ही (न यन्ति) = नहीं जातीं, यह कभी तेरा स्मरण नहीं करता ।

(शवसस्पते) = हे सब बलों के स्वामिन् प्रभो! आपका स्मरण करता हुआ मैं जितना-जितना आपके सम्पर्क में आता हूँ उतना उतना ही अपने अन्दर शक्ति का अनुभव करता हूँ, परन्तु जब इस चमकीली प्रकृति — मोहक विषयों से मुग्ध बना हुआ मैं आपको भूल जाता हूँ और मेरी वाणी कभी आपका स्मरण नहीं करती तो मैं आपसे दूर हो जाता हूँ और शक्ति के स्रोत से सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाने से उत्तरोत्तर निर्बल होता जाता हूँ। मेरे जीवन के आनन्द की ज्योति भी टिमटिमाहट के बाद बुझ जाती है । अतः प्रभो! आप कुछ ऐसी कृपा करो कि मैं ‘शवसस्पति’ आपका स्मरण करूँ और आपके सम्पर्क में आकर शक्ति व आनन्द का लाभ करनेवाला बनूँ ।
Essence
मैं ब्रह्मा बनूँ न कि बद्ध । मेरी वाणियाँ सदा प्रभु का गायन करें।
 
Subject
बद्ध पुरुष