Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1765

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्रा꣢स्य꣣ धा꣡रा꣢ अक्षर꣣न्वृ꣡ष्णः꣢ सु꣣त꣡स्यौज꣢꣯सः । दे꣣वा꣡ꣳ अनु꣢꣯ प्र꣣भू꣡ष꣢तः ॥१७६५॥

प्र꣢ । अ꣣स्य । धा꣡राः꣢꣯ । अ꣢क्षरन् । वृ꣡ष्णः꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सः । दे꣣वा꣢न् । अ꣡नु꣢꣯ । प्र꣣भू꣡षतः । प्र꣣ । भू꣡ष꣢꣯तः ॥१७६५॥

Mantra without Swara
प्रास्य धारा अक्षरन्वृष्णः सुतस्यौजसः । देवाꣳ अनु प्रभूषतः ॥

प्र । अस्य । धाराः । अक्षरन् । वृष्णः । सुतस्य । ओजसः । देवान् । अनु । प्रभूषतः । प्र । भूषतः ॥१७६५॥

Samveda - Mantra Number : 1765
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत तृच का देवता-विषय ‘सोम' है । शरीर के अन्दर यह आहार से रस-रुधिराधि के क्रम से उत्पन्न होता है । सुतस्य अस्य = उत्पन्न हुए हुए इस सोम की (धारा:) = धारण शक्तियाँ (प्र) = प्रकर्षेण (अक्षरन्) = शरीर में प्रवाहित होती हैं । 'क्षर' धातु में केवल गति का भाव ही नहीं, गति के साथ मल को धो डालना—मल को दूर कर देने की भावना भी है। सोम की ये धाराएँ शरीर का धारण करती हैं— धारण करने का प्रकार यही है कि ये शरीर के मलों को नष्ट कर डालती हैं । मलों के नाश के द्वारा ये शरीर को नीरोग और बलवान् बनाती हैं, इसीलिए यहाँ सोम को (वृष्णः) = शक्ति देनेवाला कहा है । इस वीर्यरक्षा से पुरुष 'वृषा' बनता है । (ओजसः) = यह सोम पुरुष को 'ओजस्वी' बनाता है ‘ओज् to increase' । यह उन्नति करनेवाला होता है। सोमरक्षा के द्वारा मनुष्य की सभी क्षेत्रों में उन्नति होती है। शरीर में वह नीरोग बनता है—मलों व रोगकृमियों के नाश से यह सोम उसे स्वस्थ बनाता है। (देवान् अनु प्रभूषतः) = दिव्य गुणों को क्रम से सजाते हुए इस सोम की धाराएँ हममें प्रवाहित होती हैं। दूसरे शब्दों में हमारा मन भी इस सोम के द्वारा निर्मल होता है । यह उत्तरोत्तर दिव्य गुणों से अलंकृत होता जाता है। देवता इसीलिए तो सोम-पान करते हैं। देवलोक सोम को शरीर में ही विलीन करने के लिए प्रयत्नशील होते हैं और परिणामतः नीरोग व निर्मल बन जाते हैं । यह नीरोग व निर्मल व्यक्ति शक्तिशाली होने से 'आङ्गिरस' कहलाता है और पवित्र मनवाला होने से सबके साथ प्रेमपूर्वक मिलने के कारण 'नृ-मेध' कहलाता है । यह सोम का पान ही हमें 'नृमेध आङ्गिरस' बना सकता है। सोमरक्षा के अभाव में हममें आसुर गुण पनपते हैं – हम स्वार्थी बन जाते हैं और देवपन से दूर हो जाते हैं ।
Essence
सोमरक्षा द्वारा हम अपने जीवनों को शक्तिशाली व दिव्य गुणालंकृत बनाएँ।
Subject
शक्ति व दिव्य गुण