Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1764

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢ दि꣣वो꣢꣫ वसू꣣तो꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ अधि꣢꣯ । पु꣣नान꣡ इ꣢न्द꣣वा꣡ भ꣢र ॥१७६४॥

सः꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । दि꣣वः꣢ । व꣡सु꣢꣯ । उ꣣त꣢ । उ꣢ । पृथिव्याः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । इ꣣न्दो । आ꣡ । भ꣢र ॥१७६४॥

Mantra without Swara
स नो विश्वा दिवो वसूतो पृथिव्या अधि । पुनान इन्दवा भर ॥

सः । नः । विश्वा । दिवः । वसु । उत । उ । पृथिव्याः । अधि । पुनानः । इन्दो । आ । भर ॥१७६४॥

Samveda - Mantra Number : 1764
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
अवत्सार अपनी प्रार्थना की समाप्ति पर कहता है कि (इन्दो) = हे सोम ! तू (सः) = वह (नः) = हमें (विश्वा वसु) = सब धनों को चाहे वह (दिव:) = द्युलोक के हैं उत उ और चाहे (पृथिव्याः) = पृथिवी के हैं उन्हें (पुनान:) = पवित्र करता हुआ (अधि आभर) = आधिक्येन प्राप्त करा ।

यहाँ मन्त्र में प्रकारान्तर से वही बात फिर कही गयी है कि यह सोम १. द्युलोक के वसु को प्राप्त कराता है। द्युलोक मस्तिष्क है - और मस्तिष्क का वसु 'ज्ञान' है। सोम से बुद्धि तीव्र होती है—यह ज्ञानाग्नि का ईंधन है। इसकी रक्षा से मनुष्य तीव्र बुद्धि होकर तत्त्वज्ञान प्राप्त करता है । २. यह सोम पृथिवी के वसुओं को प्राप्त कराता है। पृथिवी 'शरीर' है – शरीर का वसु 'नीरोगता' है। सोम रोगों को शरीर में प्रवेश ही नहीं करने देता । इस प्रकार यह मानव शरीर को सबल बनाता है । ३. पुनानः = यह सोम हृदय को पवित्र करता है, मन में अपवित्र भावनाएँ नहीं आ पाती ।

इस प्रकार सोमरक्षा से शरीर नीरोग बनता है, मन निर्मल होता है और बुद्धि तीव्र होती है। ये ही वे वसु हैं जिन्हें सोम' अवत्सार' को प्राप्त कराता है। इन्हें प्राप्त करके अवत्सार' उत्तम निवासवाला' बनता है— उसका जीवन रमणीयतम बन जाता है ।
Essence
हम अवत्सार बनकर उत्तम जीवनवाले बनें ।
Subject
द्युलोक व पृथिवीलोक के वसु