Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 176

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोधा ऋषिका Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
न꣡कि꣢ देवा इनीमसि꣣ न꣡ क्या यो꣢꣯पयामसि । म꣣न्त्र꣡श्रु꣢त्यं चरामसि ॥१७६॥

न꣢ । कि꣣ । देवाः । इनीमसि । न꣢ । कि꣣ । आ꣢ । यो꣣पयामसि । मन्त्रश्रु꣡त्य꣢म् । म꣣न्त्र । श्रु꣡त्य꣢꣯म् । च꣣रामसि ॥१७६॥

Mantra without Swara
नकि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि । मन्त्रश्रुत्यं चरामसि ॥

न । कि । देवाः । इनीमसि । न । कि । आ । योपयामसि । मन्त्रश्रुत्यम् । मन्त्र । श्रुत्यम् । चरामसि ॥१७६॥

Samveda - Mantra Number : 176
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र की ऋषिका 'गोधा' है । (गां वेदवाचं धारयति इति गोधा) = यहवेदवाणी का धारण करती है। मन्त्र की समाप्ति पर यह भावना स्पष्ट शब्दों में व्यक्त हो गई है - (मन्त्रश्रुत्यं चरामसि) = मन्त्रों का श्रवण करते हैं, अर्थात् नियमपूर्वक वेद का अध्ययन करते हैं और उन मन्त्रों में सुनी बातों का (चरामसि) = पालन करते हैं, उस श्रवण के अनुसार अपना आचरण बनाते हैं।

यह गोधा मन्त्रश्रुत बातों का अनुष्ठान करती हुई कभी गर्व न करते हुए कहती है कि हे (देवा:)=संसार की सब प्राकृतिक शक्तियो! आदित्य, चन्द्र, अनल, द्यौः, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन-रात और दोनों संध्याकाल तथा धर्म! आप सबको साक्षी करके कहती हूँ कि मैं (नकि इनीमसि) = वेद-प्रतिपादित नियमों की पूर्ण प्रभु तो नहीं हो गई हूँ। [ इन्=to be lord or master] (परन्तु न कि आयोपयामसि) = मैंने इन्हें अपने जीवन से बिल्कुल लुप्त भी नहीं होने दिया है [योपयति = to destroy ] । 

मनुष्य प्रथम स्थान प्राप्त न करे तो कोई बात नहीं, परन्तु पढ़े ही नहीं, यह तो ठीक नहीं। कवि का यह कथन ठीक है कि सयनों के मार्ग पर पूर्ण आक्रमण करना सम्भव नहीं तो भी उसपर चलना तो चाहिए न?
Essence
 हमारा जीवन भी गोधा की भाँति धार्मिक वह विनीत बने।
Subject
उन्नत व विनीत