Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1759

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
य꣢द्यु꣣ञ्जा꣢थे꣣ वृ꣡ष꣢णमश्विना꣣ र꣡थं꣢ घृ꣣ते꣡न꣢ नो꣣ म꣡धु꣢ना क्ष꣣त्र꣡मु꣢क्षतम् । अ꣣स्मा꣢कं꣣ ब्र꣢ह्म꣣ पृ꣡त꣢नासु जिन्वतं व꣣यं꣢꣫ धना꣣ शू꣡र꣢साता भजेमहि ॥१७५९॥

यत् । यु꣣ञ्जा꣢थे꣢इ꣡ति꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णम् । अ꣣श्विना । र꣡थ꣢꣯म् । घृ꣣ते꣡न꣢ । नः꣣ । म꣡धु꣢꣯ना । क्ष꣣त्र꣢म् । उ꣣क्षतम् । अस्मा꣡क꣢म् । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । पृ꣡त꣢꣯नासु । जि꣣न्वतम् । वय꣢म् । ध꣡ना꣢꣯ । शू꣡र꣢꣯साता । शू꣡र꣢꣯ । सा꣣ता । भजेमहि ॥१७५९॥

Mantra without Swara
यद्युञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम् । अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि ॥

यत् । युञ्जाथेइति । वृषणम् । अश्विना । रथम् । घृतेन । नः । मधुना । क्षत्रम् । उक्षतम् । अस्माकम् । ब्रह्म । पृतनासु । जिन्वतम् । वयम् । धना । शूरसाता । शूर । साता । भजेमहि ॥१७५९॥

Samveda - Mantra Number : 1759
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत्) = जब (अश्विना) = प्राणापान (वृषणं रथम्) = शक्तिशाली रथ को युञ्जाथे जोतते हैं, तब (न:) = हमारे (क्षत्रम्) = बल को (घृतेन) = दीप्ति से [घृ= दीप्ति] (मधुना) = और माधुर्य से (उक्षतम्) = सींचते हैं । प्राणापान की साधना से शरीर शक्तिशाली बनता है - और हमारी शक्ति ज्ञान की दीप्ति तथा वाणी के माधुर्य से परिपूर्ण होती है । दण्ड-बैठकों व कुश्ती से उत्पन्न शक्ति में ज्ञान की दीप्ति का तो प्राय: अभाव ही है, वाणी का माधुर्य भी कम ही मिलता है । यह प्राणापान की साधना से जनित शक्ति ज्ञान व माधुर्य से सिक्त होती है।

ज्ञान का प्रचार – यह प्राणोपासक दीर्घतमा चाहता है कि वह ज्ञान का प्रकाश औरों को भी दे पाये अतएव वह प्राणापान को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि (अस्माकम्) = हमारे (ब्रह्म) = ज्ञान को (पृतनासु) = मनुष्यों में (जिन्वतम्) = दो | हमारे ज्ञान के द्वारा मनुष्य प्रीणित हों। ।

वीर-धन—यह प्राणोपासक यह भी चाहता है कि (वयम्) = हम (शूरसाता) = शूरों से सम्भजनीय (धना) = धनों का (भजेमहि) = सेवन करें। यह कभी माँगे हुए धन के द्वारा अपना पोषण नहीं करना चाहता । इसे पुरुषार्थ प्राप्त धन ही अपने गौरव के योग्य प्रतीत होता है । यह धन मनुष्य को अशक्त नहीं बनाता । यदि मनुष्य अशक्त हो जाए तो अपनी यात्रा को क्या पूरा करेगा? एवं, सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो शक्ति की प्राप्ति है। ‘इस रथ को दुर्बल नहीं होने देना' ही हमारा सर्वप्रथम कर्त्तव्य है।
Essence
मैं प्राणोपासक बनूँ । परिणामत: ‘शक्ति, ज्ञान, माधुर्य तथा वीर-धनों को प्राप्त करके ज्ञान का प्रचार करूँ ।'
Subject
शक्तिशाली रथ