Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1754

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ꣣ता꣡ या꣢तꣳ संग꣣वे꣢ प्रा꣣त꣡रह्नो꣢꣯ म꣣ध्य꣡न्दि꣢न꣣ उ꣡दि꣢ता꣣ सू꣡र्य꣢स्य । दि꣢वा꣣ न꣢क्त꣣म꣡व꣢सा꣣ श꣡न्त꣢मेन꣣ ने꣡दानीं꣢꣯ पी꣣ति꣢र꣣श्वि꣡ना त꣢꣯तान ॥१७५४॥

उत꣢ । आ । या꣣तम् । संगवे꣢ । स꣣म् । गवे꣢ । प्रा꣣तः꣢ । अ꣡ह्नः꣢꣯ । अ । ह्नः꣣ । मध्य꣡न्दि꣢ने । उ꣡दि꣢꣯ता । उत् । इ꣣ता । सू꣡र्य꣢꣯स्य । दि꣡वा꣢꣯ । न꣡क्त꣢꣯म् । अ꣡व꣢꣯सा । श꣡न्त꣢꣯मेन । न । इ꣣दा꣡नी꣢म् । पी꣣तिः꣢ । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । आ । त꣣तान ॥१७५४॥

Mantra without Swara
उता यातꣳ संगवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । दिवा नक्तमवसा शन्तमेन नेदानीं पीतिरश्विना ततान ॥

उत । आ । यातम् । संगवे । सम् । गवे । प्रातः । अह्नः । अ । ह्नः । मध्यन्दिने । उदिता । उत् । इता । सूर्यस्य । दिवा । नक्तम् । अवसा । शन्तमेन । न । इदानीम् । पीतिः । अश्विना । आ । ततान ॥१७५४॥

Samveda - Mantra Number : 1754
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
दिन पाँच भागों में विभक्त है। सबसे प्रथम भाग यहाँ '(उदिता सूर्यस्य') = 'सूर्योदय के समय' इन शब्दों से सूचित हुआ है। दूसरा भाग ('सङ्गवे') = शब्द से कहा गया है जब गौवें अपने-अपने घरों से खुलकर चरागाहों में इकट्ठी [सङ्गव] होती हैं । तीसरा ('प्रातरह्नः') = शब्द से कहा गया हैदोपहर से पहला forenoon समय '(मध्यन्दिने')=शब्द चौथे भाग का संकेत करता है जब दिन का मध्य होता है। पाँचवें का संकेत ('दिवानक्तम्') = शब्द से हुआ है— जब दिन रात में [नक्त] परिवर्तित होना प्रारम्भ होता है । इन सब समयों पर हे अश्विनीदेवो! (शन्तमेन) = अत्यन्त शान्ति देनेवाले (अवसा) = रक्षण से आप (उत आयातम्) = अवश्य आइए । हमें दिन के पाँचों भागों में प्राणापान की साधना का ध्यान करना है। इन्हीं की साधना पर हमारा 'अवस्' रक्षण निर्भर करता है। हम इनकी साधना करेंगे तभी इन्द्रियाँ विषयों के प्रति झुकाव से बच सकेंगी। साथ ही ‘शन्तमेन' - जीवन में। सच्ची शान्ति को हम इन्हीं प्राणापानों की साधना से ही प्राप्त करेंगे । (इदानीम्) = अब इस स्थिति के होने पर (अश्विना) = हे प्राणापानो ! (पीति:) = इन्द्रियों से विषय-रसों का पान (न ततान) = नहीं विस्तृत किया जाता। अब इन्द्रियों का झुकाव विषयों की ओर नहीं रहता । वस्तुतः इस प्राणापान की साधना से उस वास्तविक रस – प्रभु के पी लेने से यह विषय-रस तो अत्यन्त तुच्छ हो जाता है । कहाँ वह महान् रस—और कहाँ यह तुच्छ विषय-रस । वह भी समय था जब इन्द्रियाँ इन विषयों से ऊपर उठ ही नहीं पाती थीं। अतिग्रहों के समान इन विषयों ने इन्द्रियों को बाँध रक्खा था, परन्तु अब तो यह विषयों के भोग का चक्र समाप्त हो गया है 'न इदानीं पीति: अश्विना ततान' । आज ही तो यह सचमुच अत्रि = राग, भय, क्रोध से अतीत हो गया है ।
Essence
हम दिन के सब भागों में प्राणसाधना का ध्यान करें, विषय-रस से ऊपर उठें ।
 
Subject
दिन के पाँचों समयों में