Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1752

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ꣡ भा꣢त्य꣣ग्नि꣢रुष꣣सा꣢म꣣नी꣡क꣢मु꣣द्वि꣡प्रा꣢꣯णां देव꣣या꣡ वाचो꣢꣯ अस्थुः । अ꣣र्वा꣡ञ्चा꣢ नू꣣न꣡ꣳ र꣢थ्ये꣣ह꣡ या꣢तं पीपि꣣वा꣡ꣳस꣢मश्विना घ꣣र्म꣡मच्छ꣢꣯ ॥१७५२॥

आ꣡ । भा꣢ति । अग्निः꣣ । उ꣣ष꣡सा꣢म् । अ꣡नी꣢꣯कम् । उत् । वि꣡प्रा꣢꣯णाम् । वि । प्रा꣣णाम् । देवयाः꣢ । दे꣣व । याः꣢ । वा꣡चः꣢꣯ । अ꣣स्थुः । अर्वा꣡ञ्चा꣢ । नू꣣न꣢म् । र꣣थ्या । इह꣢ । या꣣तम् । पीपिवा꣡ꣳस꣢म् । अ꣣श्विना । घर्म꣢म् । अ꣡च्छ꣢꣯ ॥१७५२॥

Mantra without Swara
आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विप्राणां देवया वाचो अस्थुः । अर्वाञ्चा नूनꣳ रथ्येह यातं पीपिवाꣳसमश्विना घर्ममच्छ ॥

आ । भाति । अग्निः । उषसाम् । अनीकम् । उत् । विप्राणाम् । वि । प्राणाम् । देवयाः । देव । याः । वाचः । अस्थुः । अर्वाञ्चा । नूनम् । रथ्या । इह । यातम् । पीपिवाꣳसम् । अश्विना । घर्मम् । अच्छ ॥१७५२॥

Samveda - Mantra Number : 1752
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. सत्त्वगुणी पुरुष के घर में (अग्निः आभाति) = अग्निकुण्डों में अग्नि दीप्त होती है, अर्थात् ये लोग अग्निहोत्र प्रारम्भ करते हैं । यह अग्निकुण्ड का अग्नि (उषसाम् अनीकम्) = उष:कालों का मुख है, अर्थात् उष:काल में— सूर्योदय के समय - सबसे प्रथम कार्य अग्निहोत्र होता है ।

स्वाध्याय -  २. इन यज्ञों में (विप्राणाम्) = इन सात्त्विक ज्ञानी पुरुषों की (देवया:) = प्रभु को प्राप्त करानेवाली [देवं यान्ति] (वाचः) = वाणियाँ (उदस्थुः) = ऊपर उठती हैं, अर्थात् ये सात्त्विक पुरुष वेदवाणियों का उच्चारण करते हैं । यज्ञानन्तर स्वाध्याय में वेद का अध्ययन करते हैं ।

प्राणायाम – ३. हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (नूनम्) = निश्चय से आप (रथ्या) = शरीररूप रथ को उत्तम बनानेवाले हो । प्राण - साधना से शरीर नीरोग बनता है, मन निर्मल व बुद्धि तीव्र और इस प्रकार यह शरीररूप रथ बड़ा सुन्दर बन जाता है। आप इह- यहाँ – शरीर में ही अर्वाञ्चा- शरीर में ही गति करनेवाले [अर्वाङ्-अञ्चति] होकर (आयातम्) = आइए। [मापगातमितो युवम्, इहैव स्तं प्राणापानौ]=हे प्राणापानो! आप यहीं शरीर में होओ, यहाँ से दूर न जाओ ।

दूध- रस – ४. (पीपिवांसम्) = वृद्धि के साधनभूत [प्यायी वृद्धौ] (घर्मम्) = गोदुग्ध के या फलों के रस की (अच्छ) = ओर आनेवाले होओ, अर्थात् प्रात:काल अग्निहोत्र, स्वाध्याय, व प्राणायाम के पश्चात् ये सात्त्विक पुरुष गोदुग्ध व फलों के रस का सेवन करते हैं। अब इन नित्यकृत्यों से निवृत्त होकर ५. पीपिवांसं घर्मम् (अच्छ) = वृद्धि के साधनभूत यज्ञों लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त होते हैं [घर्म-यज्ञ]। अपना दिन लोकसंग्रहात्मक कर्मों में ही बिताते हैं । स्वार्थ परिपूर्ण अतएव मलिन अयज्ञिय कर्मों को नहीं करते ।

इस प्रकार उत्तम जीवन बिताने का परिणाम यह होता है कि ये ‘अत्रि'=काम, क्रोध व लोभ से बचे रहते हैं और आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक कष्टों के पात्र नहीं होते [अ-त्रि] और इस प्रकार प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि अत्रि बनते हैं।
Essence
हम सात्त्विक जीवन बितानेवाले बनें। हमारे जीवन का कार्यक्रम १. अग्निहोत्र, २. स्वाध्याय, ३. प्राणायाम, ४. गोदुग्ध व फल-रस का सेवन तथा ५. यज्ञिय कर्मों में प्रवृत्त होना हो । 
Subject
सत्त्वगुणी पुरुष के घर में