Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 175

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवजामयः इन्द्रमातरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ई꣣ङ्ख꣡य꣢न्तीरप꣣स्यु꣢व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ जा꣣त꣡मुपा꣢꣯सते । व꣣न्वाना꣡सः꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥१७५॥

ई꣣ङ्ख꣡य꣢न्तीः । अ꣣पस्यु꣡वः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । जा꣣त꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । आ꣣सते । वन्वाना꣡सः꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥१७५॥

Mantra without Swara
ईङ्खयन्तीरपस्युव इन्द्रं जातमुपासते । वन्वानासः सुवीर्यम् ॥

ईङ्खयन्तीः । अपस्युवः । इन्द्रम् । जातम् । उप । आसते । वन्वानासः । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥१७५॥

Samveda - Mantra Number : 175
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र की ऋषिका (इन्द्रजामयः देवमातरः) = हैं - इन्द्र को जन्म देनेवाली तथा अपने अन्दर दिव्य गुणों का निर्माण करनेवाली । इस नाम से एक भावना सुव्यक्त है कि जिसे प्रभु के दर्शन करने हों उसे अपने अन्दर दिव्य गुणों की वृद्धि करने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। दिव्य गुणों की वृद्धि करके ही हम अपने को प्रभु - दर्शन का पात्र बनाते हैं। इन दिव्यगुणों का विकास शरीर में 'सुवीर्य' की रक्षा से सम्भव है, इस (सुवीर्यम्) = उत्तम वीर्य को (वन्वानासः) = विजय करने के हेतु से ये [इन्द्रजामयः देवमातर:] (ईंखयन्ती) = सदा गतिशील होती हुई जीवन-यात्रा में आगे बढ़ती हैं। गतिशीलता वीर्यरक्षा का सर्वप्रथम साधन है। गतिशील होती हुई ये ऋषिकाएँ (अपस्युव:) सदा व्यापक कर्मों को [अपस्] अपने साथ जोड़नेवाली हैं [युव:]। स्वार्थ के कर्मों में लगा रहकर भी मनुष्य वासनाओं से पूरी तरह उपर नहीं उठ सकता। इसके लिए कुछ ऊँचे लक्ष्य का होना भी आवश्यक है, अतः ये 'लोकसंग्रह ' रूप कर्मों को अपने जीवन में सम्बद्ध करती हैं। यह जीवन का ऊँचा लक्ष्य इन्हें भोग के निचले पृष्ठ पर उतरने से बचाता है, परन्तु यह लक्ष्य बन जाना भी सुगम नहीं इसके लिए ये ऋषिकाएँ (जातम्) = सदा से प्रसिद्ध उस (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली प्रभु की (उपासते) = उपासना करती हैं। यह प्रभु-उपासना उनके जीवन में विशाल मनोवृत्ति को जन्म देती है। 'हम सभी उस प्रभु के ही पुत्र हैं- - हम सब आपस में भाई-भाई हैं' – ऐसे विचार मनुष्य के मन को छोटा नहीं होने देते और उपासक को परार्थकर्म में संलग्न किये रखते हैं। ये इन सुकर्मों मे लगे रहकर सुवीर्य का विजय करते हैं तथा इस विजय से दिव्य गुणों का आधार बनते हैं और अन्त में प्रभु - दर्शन अधिकारी होते हैं। 
Essence
हम सुवीर्य की विजय करें। इसके लिए हम गतिशील हों, परार्थ के उत्तम कर्मों में अपने को लगाए रक्खें और उस प्रभु की उपासना करें।
Subject
शक्ति-रक्षा के तीन उपाय