Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1747

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- बुधगविष्ठिरावात्रेयौ Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣡बो꣢धि꣣ हो꣡ता꣢ य꣣ज꣡था꣢य दे꣣वा꣢नू꣣र्ध्वो꣢ अ꣣ग्निः꣢ सु꣣म꣡नाः꣢ प्रा꣣त꣡र꣢स्थात् । स꣡मि꣢द्धस्य꣣ रु꣡श꣢ददर्शि꣣ पा꣡जो꣢ महा꣢न्दे꣣व꣡स्तम꣢꣯सो꣣ नि꣡र꣢मोचि ॥१७४७॥

अ꣡बो꣢꣯धि । हो꣡ता꣢꣯ । य꣣ज꣡था꣢य । दे꣣वा꣢न् । ऊ꣣र्ध्वः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । सु꣣म꣡नाः꣢ । सु꣣ । म꣡नाः꣢꣯ । प्रा꣣तः꣢ । अ꣣स्थात् । स꣡मि꣢꣯द्धस्य । सम् । इ꣣द्धस्य । रु꣡श꣢꣯त् । अ꣡दर्शि । पा꣡जः꣢꣯ । म꣣हा꣢न् । दे꣣वः꣢ । त꣡म꣢꣯सः । निः । अ꣣मोचि ॥१७४७॥

Mantra without Swara
अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात् । समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान्देवस्तमसो निरमोचि ॥

अबोधि । होता । यजथाय । देवान् । ऊर्ध्वः । अग्निः । सुमनाः । सु । मनाः । प्रातः । अस्थात् । समिद्धस्य । सम् । इद्धस्य । रुशत् । अदर्शि । पाजः । महान् । देवः । तमसः । निः । अमोचि ॥१७४७॥

Samveda - Mantra Number : 1747
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि बुध-ज्ञानी व 'गविष्ठिर'= इन्द्रियों का अधिष्ठाता – जितेन्द्रिय है। ‘यह ऐसा कैसे बन पाया ?' इसका रहस्य निम्न चार बातों में छिपा है—

१. सबसे प्रथम तो यह (होता) = माता-पिता, आचार्य के प्रति अपना पूर्ण समर्पण करनेवाला (देवान् यजथाय) = देवों के साथ सङ्गतीकरण के द्वारा (अबोधि) = उद्बुद्ध हुआ [यजथाय=यजथेन]। ज्ञानी बनने के लिए दो बातें आवश्यक हैं [क] माता पिता व आचार्य के प्रति समर्पण – उनके निर्देशों का पूर्णरूपेण पालन तथा [ख] उनका सङ्गतीकरण- सदा उनके सम्पर्क में रहना । ५ वर्ष तक माता के शिक्षणालय में, ८ वर्ष तक पिता के शिक्षणालय में, फिर २४ वर्ष तक आचार्यकुल में रहकर यह उनके ज्ञान को अपने में संचरित करता है, तभी यह अग्नि के रूप में उद्बुद्ध होता हैज्ञानवान् बनता है।

२. अब जीवन के द्वितीय प्रयाण में (अग्नि:) = यह आगे और आगे बढ़नेवाला व्यक्ति (सुमनाः) = प्रशस्त मनवाला होता हुआ (प्रातः) = बहुत सवेरे (ऊर्ध्वः अस्थात्) = ऊपर उठ खड़ा होता है । गृहस्थ के लिए भी दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं [क] सदा उत्तम मनवाला होने का प्रयत्न करे, किसी से वैर-विरोध न करे, मधुर बनने के लिए प्रयत्नशील हो । [ख] प्रातः काल उठ खड़ा हो, अर्थात् आलस्य को दूर भगाकर सदा पुरुषार्थमय जीवन बिताये ।

३. गृहस्थ के पश्चात् जीवन के तृतीय प्रयाण में यह वनस्थ होकर सतत स्वाध्याय में जीवन यापन करता है और (समिद्धस्य) = ज्ञान की दीप्ति से दीप्त हुए इस वनस्थ का (पाज:) = तेज रुशत्-चमकता हुआ (अदर्शि) = दिखता है । 
वानप्रस्थ ने फिर से साधना करके [क] ज्ञान तथा [ख] तेज का सम्पादन करना है। ज्ञानी व तेजस्वी बनकर ही तो वह अब लोकहित में प्रवृत्त होगा।

४. ज्ञानी व तेजस्वी बनकर यह संन्यस्त होता है। प्रभु का प्रतिरूप-सा बनता है । यह (महान् देव:) = महादेव बना हुआ (तमसः) = अन्धकार से (निरमोचि) = स्वयं तो मुक्त हो ही जाता है—सम्पूर्ण जगत् को अन्धकार से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील होता है । यह [क] महान्=[मह पूजायाम्] पूजा की वृत्तिवाला है – सदा प्रभु का नाम-स्मरण करता है और [ख] देव:=[दीपनाद् वा द्योतनाद्वा] स्वयं ज्ञान से दीप्त होता है और संसार को ज्ञान से द्योतित करता है ।
Essence
मेरा जीवन आचार्यों के प्रति पूर्ण समर्पण व उनके सङ्गतीकरण से प्रारम्भ हो । गृहस्थ में प्रशस्त मनवाला व आलस्य को दूर भगानेवाला बनूँ । वनस्थ होकर मैं ज्ञान व तेज का संचय करूँ और अन्तिम प्रयाण में प्रभु-पूजा व ज्ञान-प्रसार ही मेरा ध्येय हो।
 
Subject
प्रारम्भ से अन्त तक कैसे?