Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1742

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सा꣡ नो꣢ अ꣣द्या꣢भ꣣र꣡द्व꣢सु꣣꣬र्व्यु꣢꣯च्छा दुहितर्दिवः । यो꣢꣫ व्यौच्छः꣣ स꣡ही꣢यसि स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४२॥

सा꣢ । नः꣡ । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । आ꣣भर꣡द्व꣢सुः । आ꣣भर꣢त् । व꣣सुः । वि꣢ । उ꣣च्छ । दुहितः । दिवः । या꣢ । उ꣣ । व्यौ꣡च्छः꣢꣯ । वि꣣ । औ꣡च्छः꣢꣯ । स꣡ही꣢꣯यसि । स꣣त्य꣡श्र꣢वसि । स꣣त्य꣢ । श्र꣣वसि । वाय्ये꣢ । सु꣡जा꣢꣯ते । सु । जा꣣ते । अ꣡श्व꣢꣯सूनृते । अ꣡श्व꣢꣯ । सू꣣नृते ॥१७४२॥

Mantra without Swara
सा नो अद्याभरद्वसुर्व्युच्छा दुहितर्दिवः । यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥

सा । नः । अद्य । अ । द्य । आभरद्वसुः । आभरत् । वसुः । वि । उच्छ । दुहितः । दिवः । या । उ । व्यौच्छः । वि । औच्छः । सहीयसि । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्व । सूनृते ॥१७४२॥

Samveda - Mantra Number : 1742
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सा) = वह उषा (नः) = हममें (अद्य) = आज (वसुः) = उत्तम धन को (आभरत्) = भर दे । हे (दिवः दुहितः) = प्रकाश को भरनेवाली उषे ! तू (व्युच्छ) = हमारे अन्धकार को दूर भगा दे । या उ जो तू निश्चय से (व्यौच्छः) = अन्धकार को दूर करती है। किस-किस में?

[क] (सहीयसि) = सहनशक्तिवाले में । [ख] (सत्यश्रवसि) = सत्य ज्ञानवाले में। [ग] (वाय्ये) = मन का विस्तार करनेवाले में । [घ] (सुजाते) = उत्तम विकासशील पुरुष में तथा [ङ] (अश्वसुनते) = व्यापक सत्य कर्म करनेवाले में ।

उषा प्रकाश प्राप्त कराती है तो वह वसु - निवास के लिए आवश्यक धन भी प्राप्त कराती ही है। वस्तुत: श्री और सरस्वती का विरोध लोकोक्तियों का विषय तो बन गया है, परन्तु ऐसे स्थलों में विलासमय श्री अभिप्रेत होती है। जीवन के लिए आवश्यक श्री तो 'वसु' है, वह स्वयं दिव्य है – उसका सरस्वती से अविरोध ही है । 
Essence
मैं उषा में जागूँ और वसु व प्रकाश को प्राप्त करूँ।
Subject
उषा हममें वसु भर दे