Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1733

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि वा꣢꣯जिनीव꣣त्य꣡श्वा꣢ꣳ अ꣣द्या꣢रु꣣णा꣡ꣳ उ꣢षः । अ꣡था꣢ नो꣣ वि꣢श्वा꣣ सौ꣡भ꣢गा꣣न्या꣡ व꣢ह ॥१७३३॥

युङ्क्ष्व । हि । वा꣣जिनीवति । अ꣡श्वा꣢꣯न् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । अ꣣रुणा꣢न् । उ꣣षः । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । सौ꣡भ꣢꣯गानि । सौ । भ꣣गानि । आ꣢ । व꣣ह ॥१७३३॥

Mantra without Swara
युङ्क्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाꣳ अद्यारुणाꣳ उषः । अथा नो विश्वा सौभगान्या वह ॥

युङ्क्ष्व । हि । वाजिनीवति । अश्वान् । अद्य । अ । द्य । अरुणान् । उषः । अथ । नः । विश्वा । सौभगानि । सौ । भगानि । आ । वह ॥१७३३॥

Samveda - Mantra Number : 1733
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(वाजिनीवति) = उत्तम अन्नों के द्वारा शक्ति देनेवाली हे (उष:) = उषे! तू (अद्य) = आज (हि) = निश्चय से (अरुणान् अश्वान्) = आरोचन अश्वों को, अर्थात् तेजस्विता से चमकते हुए इन्द्रियरूपी घोड़ों को (युङ्ङ्क्ष्व) = हमारे इस शरीररूप रथ में जोत । वे इन्द्रियरूप घोड़े तेजस्वी हों, अरुण-आरोचन हों। रुग्ण होकर हमारे इस जीवन-रथ को ये बीच में ही खड़ा न कर दें ।

(अथ) = इस प्रकार अब (न:) = हमें (विश्वा सौभगानि) = सब सौभाग्यों को (आवह) = तू प्राप्त करा । वस्तुत: इस शरीररूप रथ में इन घोड़ों के ठीक होने पर ही सब सौन्दर्य उत्पन्न होता है । ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान में वृद्धि होती है तो कर्मेन्द्रियों से शक्ति में । ज्ञान और शक्ति ही मिलकर हमें श्रीसम्पन्न करते हैं। किसी भी रथ में शक्ति एंजिन का प्रतीक है तो ज्ञान प्रकाश का । 
Essence
मेरा शरीररूप रथ सशक्त व सप्रकाश हो ।
Subject
आरोचन अश्व