Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1728

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣षो꣢ उ꣣षा꣡ अपू꣢꣯र्व्या꣣꣬ व्यु꣢꣯च्छति प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣡ वा꣢मश्विना बृ꣣ह꣢त् ॥१७२८॥

ए꣣षा꣢ । उ꣣ । उषाः꣢ । अ꣡पू꣢꣯र्व्या । अ । पू꣣र्व्या । वि꣢ । उ꣣च्छति । प्रिया꣢ । दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣢ । वा꣣म् । अश्विना । बृह꣢त् ॥१७२८॥

Mantra without Swara
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुषे वामश्विना बृहत् ॥

एषा । उ । उषाः । अपूर्व्या । अ । पूर्व्या । वि । उच्छति । प्रिया । दिवः । स्तुषे । वाम् । अश्विना । बृहत् ॥१७२८॥

Samveda - Mantra Number : 1728
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘प्रस्कण्व' है—अत्यन्त मेधावी । यह उषा को इस रूप में देखता है कि १. (एषा) = यह (उषा:) = उषा (उ) = निश्चय से (अपूर्व्या) = और पूरण करने योग्य नहीं है, अर्थात् यह पूर्ण है, इसमें किसी प्रकार की न्यूनता नहीं है। इससे प्रेरणा प्राप्त करके मैं भी अपने जीवन को पूर्ण बनाऊँ । २. यह उषा (दिवः) = प्रकाश की (प्रिया) = प्रिय है और व्युच्छति अन्धकार को दूर करती है। क्या मेरा भी यह कर्त्तव्य नहीं कि मैं अपने जीवन को उत्तरोत्तर प्रकाशमय बनाने का प्रयत्न करूँ ?

इस सारे कार्य में प्राणापान ही हमारे सहायक होते हैं, उषा अश्विनियों की सखा है। उषा में प्राणापान की साधना से ही तो हमें अपने जीवन को पूर्ण तथा प्रकाशमय बनाना है। प्राणापान की साधना से जब प्रस्कण्व का जीवन उन्नत होता है तब वह इनको सम्बोधन करते हुए कहता है कि हे (अश्विनौ) = प्राणापानो! मैं (वाम्) = आपके (बृहत्) = इस वृद्धि के साधनाभूत कार्य की (स्तुषे) = खूब ही स्तुति करता हूँ ।
Essence
उषा पूर्ण है- हम भी पूर्ण बनें । उषा अन्धकार को दूर भगाती है—हम भी प्रकाश के प्रिय हों। प्राणापान ही सब वृद्धि के साधन हैं— मैं उष:काल में प्राणसाधना अवश्य करूँ।
Subject
पूर्णता व प्रकाश के लिए प्राणसाधन