Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1717

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡ꣳ हि꣢न्वन्ति मद꣣च्यु꣢त꣣ꣳ ह꣡रिं꣢ न꣣दी꣡षु꣢ वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣र꣢म् ॥१७१७॥

त꣢म् । हि꣣न्वन्ति । मदच्यु꣡त꣢म् । म꣣द । च्यु꣡त꣢꣯म् । ह꣡रि꣢꣯म् । न꣣दी꣡षु꣢ । वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣त्सर꣢म् ॥१७१७॥

Mantra without Swara
तꣳ हिन्वन्ति मदच्युतꣳ हरिं नदीषु वाजिनम् । इन्दुमिन्द्राय मत्सरम् ॥

तम् । हिन्वन्ति । मदच्युतम् । मद । च्युतम् । हरिम् । नदीषु । वाजिनम् । इन्दुम् । इन्द्राय । मत्सरम् ॥१७१७॥

Samveda - Mantra Number : 1717
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में कहा था कि–'दुर्धी' से– दुष्ट बुद्धि से मनुष्य प्रभु के व्रतों को तोड़ते हैं। व्रतों को तोड़ने पर कष्ट आते हैं, ये कड़वे अनुभव उन्हें फिर से 'सुधी' बनाते हैं और ये सुधी पुरुष (तम्) = उस प्रभु को (हिन्वन्ति) = प्राप्त करते हैं – उस प्रभु की ओर चलते हैं जो -

१. (मदच्युतम्) = सब अहंकार के नाशक है अथवा हर्ष की वर्षा करनेवाले हैं, ‘मदच्युत्’ शब्द के ये दोनों ही अर्थ हैं और इनमें कार्यकारणभाव है। जितना - जितना अहंकार नष्ट होता जाता है उतना-उतना आनन्द अभिवृद्ध होता चलता है।

२. (हरिम्) = सब दोषों व दु:खों का हरण करनेवाले हैं। प्रभु हमारे देषों को दूर करते हैं और इस प्रकार हमारे दु:खों को भी दूर कर देते हैं।

३. (नदीषु वाजिनम्) = अपने स्तोताओं में वाजशक्ति का संचार करनेवाले हैं । हम प्रभु के स्मरण से उसके सम्पर्क में आते हैं और इस सम्पर्क से हममें प्रभु-शक्ति का प्रवाह होता है । ४. इन्दुम्=वे प्रभु परमैश्वर्यशाली हैं। उनका मित्र बन मैं भी इस परमैश्वर्य में भागीदार बनता हूँ ।

५. (इन्द्राय मत्सरम्) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जितेन्द्रिय भक्त के लिए वे प्रभु हर्ष देनेवाले हैं । प्रभु का सम्पर्क मुझे वासनाओं के विजय में समर्थ करता है। मैं इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनता हूँ और ('सर्वमात्मवशं सुखम्') इस नियम के अनुसार मेरा जीवन उल्लासमय होता है।
Essence
हम सदा प्रभु की ओर चलनेवाले बनें ।
Subject
किसकी ओर ? उस प्रभु की ओर