Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1714

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢त्ते꣣ शु꣡ष्मा꣢सो अस्थू꣣ र꣡क्षो꣢ भि꣣न्द꣡न्तो꣢ अद्रिवः । नु꣣द꣢स्व꣣ याः꣡ प꣢रि꣣स्पृ꣡धः꣢ ॥१७१४॥

उ꣢त् । ते꣣ । शु꣡ष्मा꣢꣯सः । अ꣣स्थुः । र꣡क्षः꣢꣯ । भि꣣न्द꣡न्तः꣢ । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । नुद꣡स्व꣢ । याः । प꣣रिस्पृ꣡धः꣢ । प꣣रि । स्पृ꣡धः꣢꣯ ॥१७१४॥

Mantra without Swara
उत्ते शुष्मासो अस्थू रक्षो भिन्दन्तो अद्रिवः । नुदस्व याः परिस्पृधः ॥

उत् । ते । शुष्मासः । अस्थुः । रक्षः । भिन्दन्तः । अद्रिवः । अ । द्रिवः । नुदस्व । याः । परिस्पृधः । परि । स्पृधः ॥१७१४॥

Samveda - Mantra Number : 1714
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि' अवत्सारः काश्यपः' है–‘सार= शक्ति की रक्षा करनेवाला ज्ञानी', शरीर में पहलवान तथा आत्मा में ऋषि । गत मन्त्र में इसने प्रभु के स्वागत की तैयारी की थी । प्रभु का आतिथ्य करने पर, प्रभु इससे कहते हैं -

१. (ते) = तेरे (शुष्मासः) = वासनारूप शत्रुओं का शोषण करनेवाले बल (उत् अस्थुः) = उन्नत होकर स्थित होते हैं। प्रभु के सम्पर्क में जीव में शक्ति का संचार न हो यह तो सम्भव ही नहीं ।

२. (रक्षः भिन्दन्तः) = तेरे ये बल राक्षसवृत्तियों का विदारण करनेवाले हैं। प्रभु के सम्पर्क से प्राप्त होनेवाला सात्त्विक बल हमें अपने रमण [मौज] के लिए औरों का क्षय करनेवाली राक्षसी वृत्तियों के हनन व विदारण में समर्थ करता है ।

३. हे (अद्रिवः) = अपने संकल्प से विचलित न होनेवाले इन्द्र! तू (नुदस्व) = परे ढकेल दे । किनको ? (याः परिस्पृधः) = जो तेरी उन्नति की स्पर्धा करनेवाले हैं— जो तेरी उन्नति को समाप्त करने के लिए प्रबल उत्कण्ठावाले तेरे शत्रु हैं । काम, क्रोध, लोभ आदि मनुष्य के प्रमुख शत्रु हैं, ये उसकी उन्नति को समाप्त करने में लगे हैं । यह अवत्सार प्रभु के आतिथ्य के द्वारा इनको परे धकेल देता है— अपने समीप नहीं फटकने देता। 
Essence
हम प्रभु का आतिथ्य करनेवाले बनें । इसके हमारे जीवन में निम्न परिणाम होंगे१. शक्ति की वृद्धि, २. राक्षसों का विदारण, ३. वासनाओं का विनाश ।
Subject
प्रभु के आतिथ्य के परिणाम