Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1712

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऊ꣣र्ज्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣मा꣡ हु꣢वे꣣ऽग्निं꣡ पा꣢व꣣क꣡शो꣢चिषम् । अ꣣स्मि꣢न्य꣣ज्ञे꣡ स्व꣢ध्व꣣रे꣢ ॥१७१२॥

ऊ꣣र्जः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । आ । हु꣣वे । अ꣣ग्नि꣢म् । पा꣣वक꣡शो꣢चिषम् । पा꣣वक꣢ । शो꣣चिषम् । अस्मि꣢न् । य꣣ज्ञे꣢ । स्व꣣ध्वरे꣢ । सु꣣ । अध्वरे꣡ ॥१७१२॥

Mantra without Swara
ऊर्ज्जो नपातमा हुवेऽग्निं पावकशोचिषम् । अस्मिन्यज्ञे स्वध्वरे ॥

ऊर्जः । नपातम् । आ । हुवे । अग्निम् । पावकशोचिषम् । पावक । शोचिषम् । अस्मिन् । यज्ञे । स्वध्वरे । सु । अध्वरे ॥१७१२॥

Samveda - Mantra Number : 1712
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह ‘विरूप' उस प्रभु [वि-प्र] के सम्पर्क में निरन्तर बढ़ता है और कहता है कि (अस्मिन्) = इस (स्वध्वरे) = उत्तम हिंसाशून्य यज्ञे-यज्ञरूप जीवन में [जीवन-यज्ञ में] (आहुवे) = मैं उस प्रभु को पुकारता
हूँ, जो–

१. (ऊर्ज: न-पातम्) = मेरी शक्ति को नष्ट नहीं होने देते। प्रभु के स्मरण से जीवन में वासना को स्थान नहीं मिलता और परिणामतः शक्ति शीर्ण नहीं होती ।

२. (अग्निम्) = वे प्रभु मुझे अक्षीण शक्ति बनाकर उन्नत्ति-पथ पर ले-चलनेवाले होते हैं । शक्ति की क्षीणता में किसी भी प्रकार की उन्नति सम्भव नहीं ।

३. (पावकः शोचिषम्) = वे प्रभु पवित्र ज्ञान-दीप्तिवाले हैं। ‘शक्ति की अक्षीणता, उन्नति व पवित्रता' यह क्रम है, जो इस मन्त्र में संकेतित हुआ है । अक्षीण शक्ति बनकर मैं आगे बढ़ता हूँ। मेरी इस आगे बढ़ने की प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं हो तो 
Essence
‘विरूप' बनने के लिए हम उस प्रभु का स्मरण करें जो हमारी शक्तियों को क्षीण नहीं होने देते—उन्नति-पथ पर आगे ले-चलते हैं और पवित्र ज्ञानदीप्ति प्राप्त कराते हैं
Subject
विरूप द्वारा प्रभु का आह्वान