Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1711

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्निः꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना꣣ शु꣡म्भा꣢नस्त꣣न्वा३ꣳ स्वा꣢म् । क꣣वि꣡र्विप्रे꣢꣯ण वावृधे ॥१७११॥

अ꣣ग्निः꣢ । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । ज꣡न्म꣢꣯ना । शु꣡म्भा꣢꣯नः । त꣣न्व꣢म् । स्वाम् । क꣣विः꣢ । वि꣡प्रे꣢꣯ण । वि । प्रे꣣ण । वावृधे ॥१७११॥

Mantra without Swara
अग्निः प्रत्नेन जन्मना शुम्भानस्तन्वा३ꣳ स्वाम् । कविर्विप्रेण वावृधे ॥

अग्निः । प्रत्नेन । जन्मना । शुम्भानः । तन्वम् । स्वाम् । कविः । विप्रेण । वि । प्रेण । वावृधे ॥१७११॥

Samveda - Mantra Number : 1711
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘विरूप आङ्गिरस' है— विशिष्टरूपवाला अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्तिवाला। 'यह ऐसा कैसे बन पाया ?' इस प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत मन्त्र में इस प्रकार दिया गया है

१. (अग्निः) = यह अग्नि है - अपने को आगे और आगे प्राप्त करानेवाला है। ‘उन्नति' इसके जीवन का मूल मन्त्र है ।

२. (प्रत्नेन जन्मना) = देर से चले आ रहे सनातन विकास से [जनी प्रादुर्भावे] यह विरूप बना है । इसी एक जन्म में इसने यह सारी उन्नति कर ली हो, यह बात नहीं । अनेक जन्मों से यह इस उन्नति के मार्ग पर आगे और आगे बढ़ रहा है ।

३. (स्वां तन्वाम्) = अपने शरीर को यह (शुम्भान:) = ‘दमन, दान, दया' आदि गुणों से अलंकृत करने में लगा है। जन्म-जन्मान्तरों से उन्नति-पथ पर बढ़ता हुआ यह अनेक उत्तम गुणों से अपने जीवन को सुशोभित कर सका है।

४. (कविः) = यह क्रान्तदर्शी है । पैनी दृष्टिवाला है – विषयों की आपातरमणीयता इसे उलझा नहीं सकती । कवि होने से यह उनके विषमय परिणाम को भी देख पाया है।

५. (विप्रेण वावृधे) = यह उस विशेष पूरण करनेवाले प्रभु के सम्पर्क से दिनों-दिन बढ़ पाया है।

प्रभु के सम्पर्क ने ही इसे कामादि वासनाओं का शिकार नहीं होने दिया ।
Essence
विरूप के जीवन की पञ्चसूत्री यह है।

१. अग्निः=— आगे बढ़ना', यह हमारा आदर्श वाक्य हो ।

२. प्रत्नेन जन्मना=चाहे धीमे-धीमे चलें, परन्तु हम निरन्तर आगे बढ़ते चलें।

३. शुम्भानः=अपने जीवन को शुभ गुणों से सजाएँ ।

४. कविः=क्रान्तदर्शी बनना । गहराई तक देखना।

५. विप्रेण = सदा प्रभु के सम्पर्क में चलना ।
Subject
शरीर को अलंकृत करना