Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 171

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣡द꣢स꣣स्प꣢ति꣣म꣡द्भु꣢तं प्रि꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ का꣡म्य꣢म् । स꣣निं꣢ मे꣣धा꣡म꣢यासिषम् ॥१७१॥

स꣡द꣢꣯सः । प꣡ति꣢꣯म् । अ꣡द्भु꣢꣯तम् । अत् । भु꣣तम् । प्रिय꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । का꣡म्य꣢꣯म् । स꣣नि꣢म् । मे꣣धा꣢म् । अ꣣यासिषम् ॥१७१॥

Mantra without Swara
सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषम् ॥

सदसः । पतिम् । अद्भुतम् । अत् । भुतम् । प्रियम् । इन्द्रस्य । काम्यम् । सनिम् । मेधाम् । अयासिषम् ॥१७१॥

Samveda - Mantra Number : 171
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जिस प्रभु को हृदय में प्रतिष्ठित करने का उल्लेख गत मन्त्र में हुआ है, वे प्रभु (सदसः पतिम्)=  इस विशरण, गति और अवसाद - [समाप्ति] - वाले जगत् के पति हैं, (अद्भुतम्)=अभूतपूर्व हैं। न कोई उनके समान व अधिक हुआ, न है और न ही होगा। वह (इन्द्रस्य प्रियम्) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव के साथ प्रेम करनेवाले हैं। जीव प्रभु से प्रेम करे या न करे, उसका भला चाहते ही हैं। (काम्यम्) = जीव को भी चाहिए कि वह प्रभु - प्राप्ति की कामना करे। प्रभु सचमुच चाहने योग्य हैं, प्रेम करने योग्य हैं। प्रभु तो

उस प्रभु से प्रेम करके यदि मैं उसे आराधित कर पाता हूँ तो मैं उससे (सनिं मेधाम्)=संभजनीय, उत्तम सेवनीय बुद्धि को ही (अयासिषम्) = माँगता हूँ। प्रभु से खानपान, सन्तान व रुपया-पैसा ही माँगते रहने में बुद्धिमत्ता नहीं है।

मनु के लिए सर्वश्रेयस्कर वस्तु मेधा ही है। इस मेधा की याचना करनेवाला, मेधा की ओर चलनेवाला इस मन्त्र का ऋषि 'मेधातिथि' है। इस बुद्धिमत्तापूर्ण चुनाव के कारण यह 'काण्व'=अत्यन्त मेधावी है। 
Essence
ब्रह्माण्ड के पति प्रभु से हम अन्य वस्तुओं की याचना न करके बुद्धि ही
Subject
मेधा की याचना