Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1700

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢माना दि꣣व꣢꣫स्पर्य꣣न्त꣡रि꣢क्षादसृक्षत । पृ꣣थिव्या꣢꣫ अधि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१७००॥

प꣡व꣢꣯मानाः । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षात् । अ꣣सृक्षत । पृथिव्याः꣣ । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡न꣢꣯वि ॥१७००॥

Mantra without Swara
पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत । पृथिव्या अधि सानवि ॥

पवमानाः । दिवः । परि । अन्तरिक्षात् । असृक्षत । पृथिव्याः । अधि । सानवि ॥१७००॥

Samveda - Mantra Number : 1700
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(पवमाना:) = पवित्र करनेवाले सोम (दिव:) = द्युलोक के हेतु से (अन्तरिक्षात्) = अन्तरिक्ष के हेतु से  और (पृथिव्याः) = पृथिवी के हेतु से (परि असृक्षत) = इस शरीर में चारों और निर्मित हुए हैं । जब यह सोम शरीर में सारे रुधिर में व्याप्त हो जाता है, तब वह धुलोक, अन्तरिक्ष व पृथिवी को सुन्दर बनानेवाला होता है, द्युलोक, अर्थात् मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाता है, अन्तरिक्ष, अर्थात् हृदय को निर्मल बनाता है और पृथिवी, अर्थात् शरीर को दृढ़ बनाता है।

क्या शरीर, क्या मन और क्या मस्तिष्क सभी दृष्टिकोणों से यह उसे (अधि सानवि) = शिखर पर पहुँचानेवाला होता है । यह सोम द्युलोक को उग्र तेजस्वी बनाता है, अर्थात् मस्तिष्क को दीप्त करता है, पृथिवी, अर्थात् शरीर को दृढ़ बनाता है और अन्तरिक्षरूपी हृदय में उचित राग का निर्माण करता है।
Essence
सोम हमारी त्रिलोकी को सुभूषित करता है ।
Subject
शिखर पर, त्रिलोकी का सजाना