Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 170

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्य꣡मु꣢ वः सत्रा꣣साहं꣣ वि꣡श्वा꣢सु गी꣣र्ष्वा꣡य꣢तम् । आ꣡ च्या꣢वयस्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१७०॥

त्य꣢म् । उ꣣ । वः । सत्रासा꣡ह꣢म् । स꣣त्रा । सा꣡ह꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯सु । गी꣣र्षु꣢ । आ꣡य꣢꣯तम् । आ । य꣣तम् । आ꣢ । च्या꣣वयसि । ऊत꣡ये꣢ ॥१७०॥

Mantra without Swara
त्यमु वः सत्रासाहं विश्वासु गीर्ष्वायतम् । आ च्यावयस्यूतये ॥

त्यम् । उ । वः । सत्रासाहम् । सत्रा । साहम् । विश्वासु । गीर्षु । आयतम् । आ । यतम् । आ । च्यावयसि । ऊतये ॥१७०॥

Samveda - Mantra Number : 170
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ज्ञान को अपनी शरण बनानेवाला " श्रुतकक्ष उत्तम शरणवाला ‘सुकक्ष' शक्तिशाली ‘आङ्गिरस' है। यह कहता है कि हे मनुष्य! जो (व:) = तुम सबके (सत्रासाहम्) = शत्रुओं का पराभव करनेवाला है, और जो विश्वासु गीर्षु- सब वेदवाणियों के अन्दर (आयतम्) = फैला हुआ है, तुम (त्यम्) = उसे (उ) = ही (ऊतये) = रक्षा के लिए (आच्यावयसि) = अपने में अवतीर्ण करो।

यह मनुष्य की शक्ति से बाहर की बात है कि वह कामादि अत्यन्त प्रबल शत्रुओं का मुक़ाबिला कर सके। उनसे रक्षा के लिए आवश्यक है कि वह अपने अन्दर प्रभु को, उसकी दिव्यता को अवतरित करे। प्रभु ही इन शत्रुओं का पराभव करनेवाले हैं। सारे वेदों में इस प्रभु की महिमा का भिन्न-भिन्न प्रकार से वर्णन है। प्रभु की शक्ति को अपने अन्दर अवतीर्ण करना ही हमारा परम ध्येय होना चाहिए।
Essence
मैं अपने हृदय में कामारि [महादेव] की प्रतिष्ठा करूँ, जिससे काम वहाँ से भाग जाए।
Subject
दिव्यता का अवतरण