Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 17

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢श्वं꣣ न꣢ त्वा꣣ वा꣡र꣢वन्तं व꣣न्द꣡ध्या꣢ अ꣣ग्निं꣡ नमो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तमध्व꣣रा꣡णा꣢म् ॥१७॥

अ꣡श्व꣢꣯म् । न । त्वा꣣ । वा꣡र꣢꣯वन्तम् व꣣न्द꣡ध्यै꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् न꣡मो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तम् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯न्तम् । अ꣣ध्वरा꣡णा꣢म् ॥१७॥

Mantra without Swara
अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः । सम्राजन्तमध्वराणाम् ॥

अश्वम् । न । त्वा । वारवन्तम् वन्दध्यै । अग्निम् नमोभिः । सम्राजन्तम् । सम् । राजन्तम् । अध्वराणाम् ॥१७॥

Samveda - Mantra Number : 17
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हम (वार-वन्तं)=प्रशस्तरूप से शत्रुओं का निवारण करनेवाले [वार= निवारण, मतुप् प्रशंसायाम्] (अश्वं न)=घोड़े के समान (त्वा)= उस (अग्रिङम्)=प्रभु का नमोभिः=नमस्कारों से (वन्दध्या)= वन्दन के लिए प्रवृत्त हुए हैं। किस प्रभु का ? (अध्वराणाम्) - सब यज्ञों के (सम्राजम्)= सम्राट् (तम्)= उस प्रभु का।
पिछले मन्त्र में यह भावना स्पष्ट थी कि इन्द्रियाँ यज्ञों में प्रवृत्त रहें, इसके लिए प्रभुचिन्तन आवश्यक है। प्रभु - चिन्तन उन्हें असुरों के आक्रमण से बचाता है। इस मन्त्र में इसी भावना को इन शब्दों में कहा गया है कि जैसे उत्तम घोड़ा शत्रुओं पर आक्रमण कर उन्हें दूर भगा देता है, उसी प्रकार वे प्रभु भी सभी यज्ञध्वंसक बुरी वृत्तियों को दूर करके यज्ञ को निर्विघ्न पूरा कराते हैं। मनुष्य को सदा इस तत्त्व को समझते हुए प्रभु के प्रति नतमस्तक होना चाहिए। तभी हम अपने वास्तविक सुख का निर्माण कर सकेंगे, और ‘शुन: शेप' कहलाने के योग्य होंगे।
Essence
परमेश्वर रक्षक न हो तो हम किसी भी कार्य को सफलता से सम्पन्न नहीं कर सकेंगे, अतः कभी भी सफलता का गर्व नहीं करना चाहिए।
Subject
प्रभु-रक्षण से ही यज्ञ चलते हैं