Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1698

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य꣢ उ꣣ग्रः꣡ सन्ननि꣢꣯ष्टृतः स्थि꣣रो꣡ रणा꣢꣯य꣣ स꣡ꣳस्कृ꣢तः । य꣡दि꣢ स्तो꣣तु꣢र्म꣣घ꣡वा꣢ शृ꣣ण꣢व꣣द्ध꣢वं꣣ ने꣡न्द्रो꣢ योष꣣त्या꣡ ग꣢मत् ॥१६९८॥

यः । उ꣣ग्रः꣢ । सन् । अ꣡नि꣢꣯ष्टृतः । अ । नि꣣ष्टृतः । स्थिरः꣢ । र꣡णा꣢꣯य । स꣡ꣳस्कृ꣢꣯तः । सम् । कृ꣣तः । य꣡दि꣢ । स्तो꣣तुः꣢ । म꣣घ꣡वा꣢ । शृ꣣ण꣡व꣢त् । ह꣡व꣢꣯म् । न । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यो꣣षति । आ꣢ । ग꣣मत् ॥१६९८॥

Mantra without Swara
य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय सꣳस्कृतः । यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत् ॥

यः । उग्रः । सन् । अनिष्टृतः । अ । निष्टृतः । स्थिरः । रणाय । सꣳस्कृतः । सम् । कृतः । यदि । स्तोतुः । मघवा । शृणवत् । हवम् । न । इन्द्रः । योषति । आ । गमत् ॥१६९८॥

Samveda - Mantra Number : 1698
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः) = जो मेधातिथि (उग्रः) = ओजस्वी व उदात्त है- जिसे कायरता छू नहीं गयी, (सन्) = ऐसा होता हुआ यह (अनिष्टृतः) = शत्रुओं से तीर्ण नहीं किया जा सकता, अर्थात् शत्रु इसे दबा नहीं लेते । (स्थिर:) = यह अपने कार्य में स्थिर वृत्तिवाला होता है तथा स्थितप्रज्ञ होने से डाँवाँडोल नहीं होता । यह तो (रणाय) = युद्ध के लिए (संस्कृत:) = पूर्णरूप से तैयारीवाला होता है । आन्तरिक शत्रुओं से तो इसने युद्ध किया ही है, बाहर भी बुराइयों को दूर करने के लिए यदि संघर्ष होता है तो यह घबरा नहीं जाता।

यही व्यक्ति वस्तुतः प्रभु का सच्चा स्तोता है। सर्वभूतहित में लगा हुआ व्यक्ति ही तो प्रभु का भक्ततम है। (यदि) = यदि यह स्तोता संकट में कभी प्रभु को सहायता के लिए पुकारता है तो (मघवा) = सम्पूर्ण ऐश्वर्योवाला प्रभु (स्तोतुः) = इस स्तोता की (हवम्) = पुकार को (शृणवत्) = सुनता है और (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (न योषति) = अलग तमाशबीन की भाँति खड़ा नहीं रहता, अपितु (आगमत्) = इसकी सहायता के लिए आता ही है, अर्थात् प्रभु इन लोकसेवकों के साथी होते हैं और प्रभु के साहाय्य से ये उस उस कार्य को करने में समर्थ हो जाते हैं । वस्तुतः इनका अपना तो कार्य होता ही नहीं—ये तो प्रभु के कार्य को उसके निमित्त [agent] बनकर कर रहे होते हैं। 
Essence
हम उदात्त, शत्रुओं से अनाक्रान्त, स्थिर वृत्ति के बनें । संसार संघर्ष को बड़े परिष्कृत प्रकार से चलानेवाले हों, सदा प्रभु के स्मरण से अपने में शक्ति का संचार करनेवाले हों ।
Subject
प्रभु लोकसेवक का साथी है