Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1697

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
दा꣣ना꣢ मृ꣣गो꣡ न वा꣢꣯र꣣णः꣡ पु꣢रु꣣त्रा꣢ च꣣र꣡थं꣢ दधे । न꣡ कि꣢ष्ट्वा꣣ नि꣡ य꣢म꣣दा꣢ सु꣣ते꣡ ग꣢मो म꣣हा꣡ꣳश्च꣢र꣣स्यो꣡ज꣢सा ॥१६९७॥

दा꣣ना꣢ । मृ꣣गः꣢ । न । वा꣣रणः꣢ । पु꣣रुत्रा꣢ । च꣣र꣡थ꣢म् । द꣣धे । न꣢ । किः꣣ । त्वा । नि꣢ । य꣣मत् । आ꣢ । सु꣣ते꣢ । ग꣣मः । महा꣢न् । च꣣रसि । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥१६९७॥

Mantra without Swara
दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा चरथं दधे । न किष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महाꣳश्चरस्योजसा ॥

दाना । मृगः । न । वारणः । पुरुत्रा । चरथम् । दधे । न । किः । त्वा । नि । यमत् । आ । सुते । गमः । महान् । चरसि । ओजसा ॥१६९७॥

Samveda - Mantra Number : 1697
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
न प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि मेधातिथि (दाना) =[दान् to cut] बुराइयों – स्वार्थ की वृत्तियों को काटनेवाला होता है । (मृगः) = इसी उद्देश्य से यह [मृग अन्वेषणे] अपना अन्वेषण, अर्थात् आत्मालोचन करनेवाला बनता है। इसी भावना को १६९२ मन्त्र में 'उरामथि' शब्द द्वारा कहा गया था। इस मार्ग पर चलते हुए कोई भी सांसारिक कार्य इसे (न वारणः) = रोकनेवाला नहीं होता । यह (पुरुत्रा) = पालन व पूरण के क्षेत्र में चरथम्=गति को दधे धारण करता है, अर्थात् पालनात्मक व पूरणात्मक कार्यों में लगा रहता है । 

प्रभु इस मेधातिथि से कहते हैं कि- (त्वा) = तुझे अपने इस पालनात्मक कार्य में (न कि: नियमत्) = कोई भी रोकता नहीं। तू लोकस्तुति व लोकापवाद से अथवा धनागम के लोभ व धननाशभय से अपने इस न्यायमार्ग से विचलित नहीं होता । तू (सुते) = निर्माणात्मक कार्यों में (आगम:) = सर्वथा प्रवृत्त रहता है ।

(महान्) = विशाल हृदयवाला बनकर तू (ओजसा) = बल के साथ (चरसि) = विचरण करता है । तेरी कार्यनीति ढिलमिल weak-kneed नहीं होती । तुझमें संकुचित हृदयता तो नहीं होती, परन्तु साथ ही भय भी नहीं होता । 'किसी की नाराज़गी का भय ही बना रहे ' तब तो किसी भी कार्य का करना सम्भव ही नहीं। यह मेधातिथि ओजस्वी बनकर चलता है तभी तो लोकहित करने में कुछ समर्थ हो पाता है।
Essence
हम आत्मालोचन के द्वारा बुराइयों को ढूँढ-ढूँढकर काट डालें और महान् व ओजस्वी बनकर निर्माणात्मक कार्यों में प्रवृत्त हों ।
Subject
महान् व ओजस्वी