Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1686

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तं꣢ वो꣣ वा꣡जा꣢नां꣣ प꣢ति꣣म꣡हू꣢महि श्रव꣣स्य꣡वः꣢ । अ꣡प्रा꣢युभिर्य꣣ज्ञे꣡भि꣢र्वावृ꣣धे꣡न्य꣢म् ॥१६८६॥

तम् । वः꣣ । वा꣡जा꣢꣯नाम् । प꣡ति꣢꣯म् । अ꣡हू꣢꣯महि । श्र꣣वस्य꣡वः꣢ । अ꣡प्रा꣢꣯युभिः । अ । प्रा꣣युभिः । यज्ञे꣡भिः꣢ । वा꣣वृधे꣡न्य꣢म् ॥१६८६॥

Mantra without Swara
तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः । अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम् ॥

तम् । वः । वाजानाम् । पतिम् । अहूमहि । श्रवस्यवः । अप्रायुभिः । अ । प्रायुभिः । यज्ञेभिः । वावृधेन्यम् ॥१६८६॥

Samveda - Mantra Number : 1686
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(श्रवस्यवः) = यश चाहनेवाले हम यशस्वी कर्म ही करें, अशुभ कर्मों से दूर रहें, इसलिए (तम्) = उस (वः) = तुम सबके (वाजनां पतिम्) = शक्तियों के पति प्रभु को हम (अहूमहि) = पुकारते हैं । सत्य यही है कि सब शक्तियों के देनेवाले वे प्रभु ही हैं। उस प्रभु से शक्ति प्राप्त करके ही कोई व्यक्ति शक्तिशाली कार्य कर पाता है और यश का भागी बनता है ।

वे प्रभु (अप्रायुभिः) = निरन्तर होनेवाले [अप्रायु unceasing] (यज्ञेभिः) = यज्ञों से (वावृधेन्यम्) = हमें बढ़ानेवाले हैं। यदि हम अपने जीवन में यज्ञों को अपनाएँगे तो सदा फूलें-फलेंगे । प्रभु ने सृष्टि के प्रारम्भ में हमें यज्ञ ही दिया था और यही कहा था कि यह तुम्हारी सब इष्ट-कामनाओं को पूर्ण करनेवाला होगा।

यज्ञों के द्वारा १. यश मिलता है [श्रवस्यवः], २. वृद्धि प्राप्त होती है [वावृधेन्यम्], ३. शक्ति बढ़ती है [वाज]। यज्ञ की मौलिक भावना 'स्वार्थत्याग' है । स्वार्थत्यागवाला व्यक्ति व्यापक मनोवृत्तिवाला होने से 'विश्वमना' है । यह यज्ञों में लगे रहने से उत्तम इन्द्रियरूप अश्वोंवाला बन कर 'वैयश्व' कहलाता है ।
Essence
प्रभु से उपदिष्ट यज्ञों को अपनाकर हम इस संसार में फूलें-फलें और परलोक में कल्याण प्राप्त करें ।
Subject
इष्टकामधुक् यज्ञ