Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1685

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢ स्थातर्हरीणां꣣ न꣡ कि꣢ष्टे पू꣣र्व्य꣡स्तु꣢तिम् । उ꣡दा꣢नꣳश꣣ श꣡व꣢सा꣣ न꣢ भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१६८५॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । स्था꣣तः । हरीणाम् । न꣢ । किः꣣ । ते । पूर्व्य꣡स्तु꣢तिम् । पू꣣र्व्य꣢ । स्तु꣣तिम् । उ꣢त् । आ꣣नꣳश । श꣡व꣢꣯सा । न । भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१६८५॥

Mantra without Swara
इन्द्र स्थातर्हरीणां न किष्टे पूर्व्यस्तुतिम् । उदानꣳश शवसा न भन्दना ॥

इन्द्र । स्थातः । हरीणाम् । न । किः । ते । पूर्व्यस्तुतिम् । पूर्व्य । स्तुतिम् । उत् । आनꣳश । शवसा । न । भन्दना ॥१६८५॥

Samveda - Mantra Number : 1685
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! (हरीणाम्) = इन्द्रियरूप अश्वों के ऊपर (स्थातः) = स्थित होनेवाले ! (ते) = तेरी (पूर्व्यस्तुतिम्) = मुख्य स्तुति को (न कि:) = न तो (शवसा) = बल से और न न ही (भन्दना) = तेज व शुभ कर्मों से (उदानंश) = कोई भी पाता है ।

अर्थात् जितना महत्त्व जितेन्द्रियता का है उतना न बल और तेज का और न ही शुभ कर्मों का है । वास्तविकता तो यह है कि जितेन्द्रियता के बिना न तो मनुष्य बलवान् और तेजस्वी हो सकता है और न ही उसकी शुभ कर्मों में प्रवृत्ति होती है । इस सारी बात का विचार करके ही आचार्य दयानन्द ने जितेन्द्रियता को सदाचार में प्रथम स्थान दिया है । मनु ने इसे सिद्धि की प्राप्ति के लिए आवश्यक माना है—(‘सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति') । जितेन्द्रियता वह केन्द्र है जिसके चारों ओर सदाचार के सब अङ्ग घूमते हैं ।

इस प्रकार स्पष्ट है कि मनुष्य जितेन्द्रियता को अपना मौलिक कर्त्तव्य समझे । ऐसा समझने पर ही तो वह इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनकर 'वैयश्व' = विशिष्ट इन्द्रियरूप अश्वोंवाला बनेगा। ऐसा होने पर ही यह विश्वमनाः = व्यापक मनवाला भी बन पाएगा।
Essence
हम अपने जीवन मैं जितेन्द्रियता को सर्वाधिक महत्त्व दें ।
 
Subject
जितेन्द्रियता