Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1684

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ए꣢दु꣣ म꣡धो꣢र्म꣣दि꣡न्त꣢रꣳ सि꣣ञ्चा꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡न्ध꣢सः । ए꣣वा꣢꣫ हि वी꣣र꣡ स्तव꣢꣯ते स꣣दा꣡वृ꣢धः ॥१६८४॥

आ꣢ । इत् । उ꣣ । म꣡धोः꣢꣯ । म꣣दि꣡न्त꣢रम् । सि꣣ञ्च꣢ । अ꣣ध्वर्यो । अ꣡न्ध꣢꣯सः । ए꣣व꣢ । हि । वी꣣र꣢ । स्त꣡व꣢꣯ते । स꣣दा꣡वृ꣢धः । स꣣दा꣢ । वृ꣣धः ॥१६८४॥

Mantra without Swara
एदु मधोर्मदिन्तरꣳ सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः । एवा हि वीर स्तवते सदावृधः ॥

आ । इत् । उ । मधोः । मदिन्तरम् । सिञ्च । अध्वर्यो । अन्धसः । एव । हि । वीर । स्तवते । सदावृधः । सदा । वृधः ॥१६८४॥

Samveda - Mantra Number : 1684
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मन्त्र ३८५ संख्या पर आ चुका है। सरलार्थ यह है—

हे (अध्वर्यो) = जीवन को यज्ञरूप बनानेवाले जीव ! (मधोः) = पुष्परस व शहद से भी (मदिन्तरम्) = अधिक मद का अनुभव करानेवाले (अन्धसः) = आध्यातव्य सोम का (इत्) = निश्चय से (आसिञ्च) = अपने में सर्वत: सेचन कर। (एव) = इस प्रकार (हि) = निश्चय से १. (वीर:) = तू वीर होगा २. (सदावृधः) = सदा वृद्धिवाला होगा। यह सदावृध वीर ही (स्तवते) = प्रभु से प्रशंसा को प्राप्त होता है । वस्तुत: यही व्यक्ति व्यापक मनोवृत्तिवाला बनकर 'विश्वमना' = होता है, उत्तम इन्द्रियरूप अश्वोंवाला होने से 'वैयश्व'होता है ।
Essence
हम सोम का शरीर में सेचन करके वीर व सदा वर्धमान बनें ।
Subject
मधु से अधिक मदिर